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आत्मा को स्पर्श करती “स्मृति नाद”

किताब “स्मृति नाद” के साथ बैठा व्यक्ति, यादों और भावनाओं में खोया हुआ

पुस्तक समीक्षा

प्रोफेसर साधना, एम.ए.पीएच.डी

अपूर्वा की सद्य प्रकाशित कृति ‘स्मृति नाद’केवल कविताओं का संग्रह नहीं बल्कि स्मृतियों की वह पोटली है जिसके खुलते ही बचपन से लेकर अब तक के सफर के पन्ने वास्तव में संवेदनाओं के गहरे संसार में ले जाते हैं। समस्त कविताएं भावनाओं की वह सरिता है जिसमें शब्द कमल की भांति खिलते हैं और हर पंक्ति हृदय के आंगन में मधुर सुवास बिखेर जाती है। बेटी होने की नियति को रेखांकित करते हुए अपूर्वा कहती है…
फिसल जाता है हथेलियों से
पीहर का अंगना

और छूट जाती है
गली के मोड़ पर
हाथ हिलाती मां
पीहर की अनगिन यादें और और मां पर लिखी गई पंक्तियां… हर शब्द में हृदय की धड़कन, पीड़ा, स्मृतियों की धूप और सूनापन सब साथ-साथ चले हैं। पिता के जाने का चित्रण इस कृति का सबसे करुण और मर्मस्पर्शी पक्ष है। यहां शब्द नहीं बल्कि मौन गूंजता है… एक ऐसा मौन, एक अभाव किसी सूने आकाश की तरह फैलता है जिसमे यादों के तारे टिमटिमाते तो हैं पर एक चांद की कमी हमेशा महसूस होती है। जहां एक ओर मां से बिछड़ कर मां का अकेला रह जाना केवल एक भौतिक दूरी का चित्रण नहीं है बल्कि यह एक भावनात्मक शून्यता का संकेत है जो दोनों पक्षों में समान रूप से विद्यमान रह जाता है,वहीं दूसरी ओर…
पिता के जाने के बाद
बेटियों को सर रखने के लिए
फिर वह चिर परिचित कांधा नहीं मिलता
उनके सर हवा में रह जाते हैं।

ये पंक्तियां अत्यंत गहन हैं। यहां अपूर्वा ने सुरक्षा ,विश्वास और भावनात्मक स्थिरता की बात की है। पिता की अनुपस्थिति की कसक हृदय की गहराइयों में ऐसे उतरी है जो शब्दों का आधार पाकर भी केवल महसूस की जा सकती है, वर्णित नहीं की जा सकती।

तुम्हारे जाने के बाद
यह भी समझ आया
कि एक क्षण की उम्र तब तक है
जब तक हम उसे
किसी के साथ बांट पाते हैं।

अपूर्वा की प्रत्येक रचना इतने गहरे अर्थ को समेटे हुए हैं कि शब्द ही नहीं मिल पाते वहां तक पहुंच पाने के लिए।
वास्तव में मां का आंचल और पिता का साया अनमोल है। छूटने पर भी कुछ नहीं छूटता।
…… मैं व्यस्त रहती हूं
खुद को समेटने में
जिंदगी तुम्हारी आहटों का
इंतजार बन कर रह गई है
कभी न खत्म होने वाला इंतजार।

बचपन पर आधारित कविताएं इस कृति की आत्मा हैं। इनमें मासूमियत सरलता और बीते दिनों की मीठी यादों का सुंदर चित्रण है। ये कविताएं पाठकों को निश्चित तौर से बचपन की गलियों तक अवश्य ले जायेंगी। नाना नानी के प्रति स्नेह केवल भाव नहीं बल्कि एक जीवंत अनुभूति बनकर उभरा है अपूर्वा की लेखनी ने स्मृतियों की सुनहरी धूप में भीगे बचपन के झरोखों को इस तरह खोला है कि अतीत की हर छवि हर कोमल स्पर्श बनकर हृदय को सहलाती है। नाना नानी के वात्सल्य की अविरल धारा में डूबा अपूर्वा का अंतर्मन आज भी स्नेहपूर्ण स्पर्श को भली-भांति जी रहा है ।अपूर्वा की कविताओं में अतीत की स्मृतियां किसी धुंधली तस्वीर की तरह नहीं बल्कि सजीव चित्रों की तरह उभरती हैं। ये स्मृतियां कभी पीहर के आंगन की मिट्टी की सोंधी खुशबू बनकर उभरी हैं तो कभी बचपन की निश्चिंत हंसी के रूप में खिल उठी हैं। उनके शब्दों में समय ठहर सा जाता है जो किसी भी सा हृदय को उसके बीते हुए संसार में स्वयं को खो देने को विवश करता है। उनकी कविताएं शब्दों से बढ़कर आत्मा को स्पर्श करती हैं। ये केवल पढ़ी नहीं जातीं बल्कि महसूस की जाती हैं, जैसे कोई पुराना गीत जो हर बार सुनने पर एक नई कसक दे जाता है। समग्रतः स्मृति नाद पारिवारिक संबंधों की संवेदनशीलता, अकेलेपन की पीड़ा और मानवीय निर्भरता की सूक्ष्मता को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत करती है। समस्त कविताएं रिश्तों की अनकही सच्चाइयों को उजागर करती हैं जहां हर संबंध अपने आप में एक आधार है, उसके अभाव में जीवन का संतुलन डगमगा जाता है। अपूर्वा की कविताओं की सबसे बड़ी शक्ति सादगी सहजता और सच्चाई है। एक-एक शब्द नि:शब्द करता है।