बिछड़ने के बाद भी दिल में बाकी प्रेम और अनकही शिकायतों की ग़ज़ल

सीमा त्रिवेदी साज
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गया जो छोड़ कर मुझको, तू मेरा आज भी क्यों है?
हवा में तेरी ख़ुशबू का तराना आज भी क्यों है?
जला कर ख़त मिरे उसने, कहा रुख़सत हुई यादें,
मगर राखों में अपना ,आशियाना आज भी क्यों है?
भँवर में छोड़ कर मुझको, न साहिल तक पहुँच पाए,
उसी डूबे सफ़र में इक ठिकाना ,आज भी क्यों है?
कि बरसों से नहीं गुज़रा तू, मेरी राह से लेकिन,
दर-ओ-दीवार पर तेरा, ज़माना आज भी क्यों है?
शिकायत है न अब कोई, न कोई वास्ता उससे,
मगर दिल पर उसी का ,हक़ जताना आज भी क्यों है?
कहा था वक़्त ने ये घाव सब, भर जाएँगे इक दिन,
खरोंचों से तिरी यादों का ,रिसना आज भी क्यों है?
कि दोषी मान बैठे हैं ,ख़ुदी को जिस अदालत में,
ग़ज़ल बन कर वहीं शिकवा, सुनाना सा भी क्यों है?
