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जब कलम बोलती है…

लेखिका रीता दास राम का साहित्यिक साक्षात्कार रीता दास राम (रीदारा)

साहित्य की जिम्मेदारी और समाज के अनकहे सच पर रीता दास राम से बातचीत।

suresh parihar editor

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वायर न्यूज़, पुणे

कवयित्री, कथाकार, उपन्यासकार और संपादक रीता दास राम (रीदारा) की बहुआयामी साहित्यिक यात्रा नौवीं कक्षा से शुरू हुई उनकी लेखन-यात्रा कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना और संपादन तक विस्तृत है. उनकी रचनाओं में स्त्री-अस्मिता, सामाजिक विषमताओं और बदलते समय की जटिलताओं को विशेष स्थान मिला है. उनसे साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी, स्त्री-अनुभवों की अभिव्यक्ति, डिजिटल माध्यमों की चुनौतियों और नई पीढ़ी के रचनाकारों के लिए मौलिकता व निरंतरता के महत्त्व पर लाइव वॉयर न्यूज के संपादक सुरेश परिहार ने बातचीत की. रीता राम दास जी से बातचीत में हम उन्हें रीदारा से संबोधित है क्यों उन्हें खुद यह नाम पसंद है. प्रस्तुत हैं उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

प्रश्न 1. आपकी साहित्यिक यात्रा कविता से लेकर कहानी, उपन्यास, आलोचना और संपादन तक फैली हुई है. इन विविध विधाओं में लेखन करते हुए क्या आपको लगता है कि हर विधा आपके भीतर के किसी अलग व्यक्तित्व को सामने लाती है? आपकी अपनी अभिव्यक्ति के सबसे करीब कौन-सी विधा है और क्यों?
रीदारा-
मैंने कविता, कहानी, उपन्यास, आलोचना, संपादन के अलावा यात्रा-संस्मरण, साक्षात्कार, लेख और स्तंभ लेखों द्वारा साहित्यिक योगदान दिया है. ऐसा करते हुए साहित्य के विस्तृत क्षेत्र और साहित्यिक परत-दर-परत गहराई का पता धीरे-धीरे ही चला. जी हाँ, हर विधा अपने में विशेष है और वह एक विशेष विचार-दृष्टि की अपेक्षा रखती है. कवि हो या लेखक, हर विधा में विचार और कहने के तरीके का अपना अंदाज होता है. आप हर जगह काव्यात्मक या गद्यात्मक एकरूपता नहीं सँजो सकते. यह बात अलग है कि हर व्यक्ति विशेष के कहने का तरीका थोड़ा अलग जरूर होता है. लेकिन किसी भी विधा में कार्य करना हो, तो उस विधा की गरिमा को सहेजना जरूरी है. हर विधा अलग तरह के लेखन का अपना संज्ञान लेती है.
मेरी अभिव्यक्ति के सबसे करीब कविता है. मेरे लेखन की शुरुआत काव्यात्मक थी. कविता ने ही मेरे लिए लेखन के रास्ते खोले. वहीं कहानी अपने, आसपास और परिचितों के अनुभवों को मनन-प्रक्रिया से गुजारने के बाद ही लिपिबद्ध हो पाती है, जबकि उपन्यास लिखते समय सामाजिक दृष्टि अपना अहम स्थान रखती है. विधा कोई भी हो, आपकी वैचारिकता का अक्स उसमें झाँकता जरूर है. बतौर कवि या लेखक आपका व्यक्तित्व आपके लेखन द्वारा सबके सामने आता ही है, उससे कोई छिप नहीं सकता. मेरी अपनी अभिव्यक्ति, मेरे विचार आप मेरी रचनाओं में देख सकते हैं. नौवीं कक्षा से मैंने लिखना शुरू किया. क्यों? यह मैं खुद भी नहीं जानती. इतना कह सकती हूँ कि कुछ कहने की इच्छा ही होगी, जो आज सबके सामने है. मेरे लिए कविता सीधे दिल से उतरती है. कविता लिखना गद्यात्मक लेखन से ज्यादा रोमांटिक है. मेरे लिए कविता लिखना आत्माभिव्यक्ति है, जो मुझमें निरंतरता लाती है और मुझे प्रिय है.

प्रश्न 2. आपके कविता संग्रह तृष्णा, गीली मिट्टी के रूपाकार और हाल ही में प्रकाशित अर्थबोध के सान्निध्य में के शीर्षक ही अलग-अलग भावभूमियों की ओर संकेत करते हैं. इन संग्रहों के बीच आपकी संवेदना और जीवन-दृष्टि में किस तरह का बदलाव आया है? क्या आपकी कविता समय के साथ अधिक आत्मकेंद्रित हुई है या सामाजिक सरोकारों से उसका जुड़ाव बढ़ा है?

रीदाराः मेरा पहला काव्य संग्रह तृष्णा (2012) और दूसरा गीली मिट्टी के रूपाकार (2016) में आया. दूसरे काव्य संग्रह के दस साल बाद, 2026 में अर्थबोध के सान्निध्य में का आना संभव हुआ. यह इसी साल प्रकाशित हुआ है. यह संग्रह मेरे लिए मंगलेश डबराल सर का आशीर्वाद है. इस पुस्तक के प्रकाशन हेतु उन्हीं की प्रेरणा और मार्गदर्शन से आगे बढ़ रही थी कि होनी (मंगलेश डबराल सर हमारे बीच नहीं रहे, उनकी स्मृति को नमन) को कुछ और ही मंजूर था. तीनों संग्रहों के शीर्षक अलग-अलग भावभूमियों की ओर संकेत करते हैं, यह सही है. यह कविता के शीर्षक, पंक्ति या अर्थ का चुनाव हो सकता है. विचार और अर्थ की गहराई ही कविताओं में अपनी बात रखते हैं.
सभी संग्रहों की कविताओं में समाज एक अहम स्थान रखता है. दृष्टि समाज पर टिकी जरूर है, लेकिन कविताएँ मेरे निजी दुखों, अनुभवों और आत्मिक चेतना को भी सहेजती हैं और वहीं से राह समाज के भीतर तक जाती है. हम जितना खुद को समझते हैं, उतनी ही गहराई से समाज को समझने के लिए भी तत्पर होते हैं. यही कारण है कि दृष्टि बरबस ही सामाजिक समस्याओं, विडंबनाओं, संघर्षों और स्थितियों से रूबरू होती हुई उनकी ओर जाती है और लेखनी अपने आप ही परत-दर-परत विचारों की गहराई व विस्तार पाती जाती है. जहाँ तक लोगों ने मुझे बताया, मेरी कविता समय के अनुसार आत्मकेंद्रित न होते हुए समाज की ओर खुलती चली गई और सामाजिक सरोकारों से जुड़ने लगी. भीतरी दुखों के बाद दृष्टि ने विस्तार पाया और मजलूमों तथा समाज में व्याप्त दुखों ने द्रवित किया. कविता में सामाजिक व्यथाओं को भी जगह मिलने लगी. सामाजिक सरोकारों से जुड़ाव बढ़ा. यही सब कुछ आप मेरे तीनों कविता संग्रहों की कविताओं में देख सकते हैं. फिर भी पाठकों का पढ़कर खुद तय करना अहम है.

प्रश्न 3. आपके उपन्यास पच्चीकारियों के दरकते अक्स पर लघु शोध भी है. इस उपन्यास की केंद्रीय संवेदना क्या है? इसके लेखन के दौरान ऐसा कौन-सा अनुभव, प्रश्न या विचार था, जिसने आपको इस रचना को पूरा करने के लिए भीतर से प्रेरित किया?
रीदारा-
मेरी पहली रुचि कविता है. यह जानते हुए भी लमही के संपादक विजय राय जी ने पहले कहानी और फिर उपन्यास लिखने के लिए प्रेरित किया. सिर्फ कहा ही नहीं, बल्कि प्रोत्साहित करते रहे. उनके कई बार कहने के बाद ही मैंने पहले कहानियाँ लिखीं, फिर उपन्यास लिखने की सोची. पच्चीकारियों के दरकते अक्स उपन्यास मेरे अपने और मेरे अपनों के अनुभवों का मेरे द्वारा दिया गया काल्पनिक विस्तार है, जिसे समाज की समकालीन पृष्ठभूमि ने रोशनी दी. समकालीन दौर के मुद्दों ने मेरे उपन्यास में अपना होना स्वीकारा. हाँ, उन्हीं घटनाओं को मेरे इस उपन्यास में जगह मिली, जिन घटनाओं ने मुझे छुआ, झकझोरा. उपन्यास का विषय स्त्री-केंद्रित है. समाज में स्त्री की होती उपेक्षा, जद्दोजहद, संकीर्ण सामाजिक विचारधारा और सोच से उसका संघर्ष जैसी बातें उपन्यास में अपना स्थान पाती हैं और कहानी आगे बढ़ती है. उपन्यास समाज की पारिवारिक इकाई की अपनी बातें और समलैंगिकता के मुद्दों को उकेरता है. संक्षिप्त में कहूँ तो समाज में परंपराओं, मान्यताओं और रीति-रिवाजों की टूटती पच्चीकारियों का अक्स आप इसमें देखते हैं. समाज में पुरानी नक्काशियाँ नए रूप गढ़ रही हैं. पच्चीकारियों के दरकते अक्स नए समय के बदलाव को प्रस्तुत करता है, चाहे वह लिव-इन में रहना हो या किन्नर बच्चे को अपनाना ही क्यों न हो. यह उपन्यास वैभव प्रकाशन, रायपुर से प्रकाशित हुआ. एक दिन भरी बारिश में एसएनडीटी महिला विश्वविद्यालय से संबद्ध श्री एम. डी. शाह महिला कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड कॉमर्स की एक लड़की, जिसका नाम आकांक्षा था, बाकायदा समय लेकर मेरे घर मेरी पुस्तक लेने आई. उसने मेरा ही उपन्यास मुझसे खरीदा. प्रकाशक से लेने में उसे और समय लग जाता, इसलिए मुझसे खरीद लिया. साल भर इस उपन्यास को लेकर अलग-अलग तरह से बातचीत करती हुई वह संपर्क में रही और अपना लघु शोध-प्रबंध सफलतापूर्वक पूरा किया. उसकी साल भर की मेहनत रंग लाई. उसका शोध पूरा हुआ. मुझे बेहद खुशी हुई कि लघु शोध-प्रबंध हेतु मेरे उपन्यास का चुनाव किया गया और वह शोध पूर्ण हुआ.
प्रश्न 4. आपने कविता में स्त्री: समकालीन पुरुष कवि का संपादन किया है. स्त्री-अनुभवों को व्यक्त करने में पुरुष कवियों की दृष्टि और स्त्री रचनाकारों की अपनी अनुभूति के बीच आपको क्या समानताएँ या बुनियादी अंतर दिखाई देते हैं? क्या किसी दूसरे की संवेदना को लिखना और अपने अनुभव को लिखना अलग तरह की रचनात्मक जिम्मेदारी है?
रीदारा-
कविता में स्त्री: समकालीन पुरुष कवि भाग 1 (2024), आपस प्रकाशन, अयोध्या से प्रकाशित हुई है. इस पुस्तक में समाहित सभी वरिष्ठ कवियों की स्त्री-विषयक कविताएँ स्त्री दर्पण फेसबुक पेज पर एक शृंखला के रूप में बतौर पोस्ट लगभग एक साल तक प्रकाशित होती रहीं. इसमें उम्र के अनुसार समकालीन वरिष्ठ कवियों की क्रमशः स्त्री-विषयक कविताएँ पढ़ी जाती रहीं. इस श्रृंखला को करने का दायित्व, आभारी हूँ कि वरिष्ठ कवि विमल कुमार जी ने मुझे सौंपा. इसे बाद में हमने पुस्तक रूप में प्रकाशित करना तय किया. इस श्रृंखला का पुस्तक रूप में आना बहुत पसंद किया गया. श्रृंखला के सारे कवियों को समाहित करने हेतु इसका दूसरा भाग भी जल्द ही आ रहा है, जिस पर काम चालू है. स्त्री के अपने अनुभव और पुरुष के स्त्री-विषयक विचारों में अंतर तो है और होगा ही. यह कुछ इस तरह है, जैसे कोई व्यक्ति जख्म, दुख, उत्तेजना या स्थिति को खुद महसूस करे और दूसरा व्यक्ति उसे सिर्फ दृष्टि, संवेदनाओं एवं सहानुभूति द्वारा आत्मसात करे. पुरुष स्त्री के दर्द को देखकर महसूस करता है, जबकि स्त्री उस स्थिति को जीती है, उससे गुजरती है. जाहिर-सी बात है कि दोनों के अनुभवों में जमीन-आसमान का अंतर है. स्थिति से गुजरता व्यक्ति अपने अनुभव बयान करता है, जिसे शाश्वत सत्य माना जा सकता है. लेकिन दूर बैठा उसे महसूस करता शख्स कभी-कभी उस स्थिति की ऐसी व्याख्या कर जाता है, जिसके बारे में किसी ने उस तरह से अब तक सोचा भी नहीं होता. यही स्थिति हमें इन कविताओं में दिखाई पड़ती है.
समाज की स्त्री (माँ, बेटी, बहन, प्रेमिका, स्त्री रूप में दोस्त या दुश्मन) की स्थिति पर रची गई इन कविताओं ने पुरुषों की दृष्टि को उधेड़ा है, जिसमें बेझिझक दर्द का बयान भी है, हूबहू जाहिर होती वेदना भी, संवेदना भी और हाँ, जीवन में स्त्री को आत्मसात करने के आह्लादित आनंद के साथ उसके बिना अधूरे जीवन की कल्पना का विस्तार भी. स्त्रियों के प्रति जो रचनात्मक जिम्मेदारी समकालीन वरिष्ठ कवियों ने निभाई है, वह अद्भुत काव्यात्मक निधि है.
प्रश्न 5. हमारा समाज और हम जैसी वैचारिक पुस्तक के साथ आपका लेखन सामाजिक प्रश्नों से भी जुड़ता है. एक लेखिका के रूप में आप साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी को किस रूप में देखती हैं? क्या साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब है, या उसे समाज की स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाने का साहस भी करना चाहिए?
रीदारा-
हमारा समाज और हम 2025 में आई मेरी पुस्तक है. 2014 से 2024 तक ये सारे लेख समय-समय पर पत्रिकाओं (नवनीत, प्रेरणा अंशु) और अखबारों (दबंग दुनिया व दैनिक दक्षिण मुंबई) में प्रकाशित होते रहे हैं. आभारी हूँ कि साहित्यिक वरिष्ठों में नवनीत पत्रिका के संपादक एवं कवि आदरणीय विश्वनाथ सचदेव जी, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक विजय कुमार जी, धर्मयुग के उपसंपादक, पत्रकार व महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके अभिलाष अवस्थी जी एवं जनसत्ता और इंडियन एक्सप्रेस के उपसंपादक रह चुके, सामाजिक कार्यकर्ता व पत्रकार पलाश विश्वास जी के प्रोत्साहन से यह कार्य संभव होता रहा. इन सभी ने मेरी लेखनी पर भरोसा जताया.

(हमारा समाज और हम, पृष्ठ-6) इसमें समाहित मेरा लेखन, जी हाँ, बिल्कुल सामाजिक प्रश्नों पर अपनी बात रखता है. सामाजिक मुद्दों, समस्याओं, विषमताओं और घटनाओं पर आप पाठक मेरे विचारों को पढ़कर जान सकते हैं. साहित्य केवल समाज का प्रतिबिंब ही नहीं, बल्कि उस सच को भी उजागर करता है, जो कहीं दबे, ढके-छिपे मर जाने पर मजबूर किए जाते हैं या जबरन मार दिए जाते हैं. ऐसे सच को सामने लाना साहित्यिक जिम्मेदारी है, जिससे आँख मिलाने से समाज में डर व्याप्त है. समाज की स्थापित धारणाओं पर सवाल उठाना अपने आप में एक साहसिक कर्म तो है ही, लेकिन स्थापित धारणाओं और मान्यताओं की कमियों को सामने लाना और लाकर समकालीन दौर में आते बदलाव को जाहिर करते हुए समाज की वैचारिक दृष्टि को बदलते देखना बड़ी बात है. इसे हर साहित्यकार अपनी लेखनी का उद्देश्य समझता है और ऐसा कर वह एक सामाजिक सरोकारात्मक कार्य से जुड़ता है.

प्रश्न 6. आपके कहानी संग्रह समय जो रुकता नहीं और चेक एंड मेट के शीर्षक जीवन, समय और परिस्थितियों के बीच मनुष्य के संघर्ष की ओर संकेत करते हैं. आपकी कहानियों में पात्रों का चयन किस तरह होता है? क्या पात्र पहले आपके मन में आकार लेते हैं, या कोई सामाजिक घटना, संबंध अथवा जीवन का छोटा-सा अनुभव कहानी का रूप लेता है?

रीदारा– हाँ, मनुष्य का जीवन समय और परिस्थितियों के बीच के संघर्षों का लेखा-जोखा है. मेरे अब तक दो कहानी संग्रह समय जो रुकता नहीं (2021) और चेक एंड मेट (2025) आए हैं. ये मेरी तमाम साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशित कहानियों का संचयन हैं. मेरी कहानियों के पात्रों का चुनाव मैं खुद करती हूँ. मेरी कहानियों के पात्र समाज में साँस लेती जिंदगियाँ हैं. मेरे परिचित, दोस्त, अचानक मिले अपरिचित यात्री, यात्रा में मिले मित्र की कोई बात या कोई बातचीत का मुद्दा, जो मेरे दिल को छू जाए, उसे काल्पनिक विस्तार देकर मैंने अपनी कहानियों को बुना है. इस बुनावट में मेरी कल्पना अपना विशेष स्थान रखती है, लेकिन सच बखूबी सामने आता है. किस घटना और समस्या पर दृष्टि किस ओर से और कैसे जानी है, यह मैं तय करती हूँ. रोशनी का स्लेटी होना भी कभी-कभी विचारों को धूमिल कर सकता है. इस बात का ख्याल रखना हर कहानीकार का अपना कर्तव्य है. मेरा उद्देश्य पात्रों के द्वारा समस्याओं, प्रश्नों और विडंबनाओं को सरेआम कर उनका संज्ञान लेना है, जो एक सरोकारात्मक सोच को अंजाम देती है. समयानुसार बदलाव तो समाज में अपने आप दिखाई पड़ने लगते ही हैं.

प्रश्न 7. आपने हिंदी उपन्यासों में मुंबई के माध्यम से एक महानगरीय परिवेश को आलोचनात्मक दृष्टि से देखा है. मुंबई जैसे शहर का साहित्यिक चित्रण करते समय वहाँ की बहुभाषिक संस्कृति, प्रवास, अकेलापन और संघर्ष किस तरह महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं? क्या महानगर व्यक्ति को अधिक स्वतंत्र बनाता है या उसकी जटिलताएँ उसे भीतर से अकेला भी करती हैं?
रीदारा:
हिंदी उपन्यासों में मुंबई मेरी पीएचडी की थीसिस है, जो पुस्तक रूप में आपके सामने है. इसमें मैंने मुंबई पर लिखे सत्रह उपन्यासों को लिया है. उनके अध्ययन, मनन और चिंतन के बाद मैंने इसे लिपिबद्ध किया है. ये सारे उपन्यास 1955 से 2014 तक लिखे गए उपन्यासों में से मेरे अपने चुनाव हैं. इनमें मुंबई के शुरुआती समाज के कोली, उद्योगपति, व्यापारी वर्ग, डॉन, वेश्याएँ, मजदूर, मंच-फिल्मी संसार, स्ट्रगलर और मुंबई की चकाचौंध से जुड़ते सभी लोग यहाँ आते हैं. यहाँ के रहवासियों में भाषा की बहुलता दिखाई पड़ती है.
विभिन्न संस्कृतियों का अलहदा विकास, व्यापार, उद्योग-धंधे, देश-विदेश से उन्नति के बेहतर मौके और इन सबके बीच अपने बेहतर भविष्य को देखने की अद्भुत इच्छा ही लोगों को मुंबई खींच लाती है.
यहाँ हर व्यक्ति अकेला है, चाहे वह कितनों के साथ आया हो या रह रहा हो. यह शहर व्यक्ति को खुद के बारे में सोचने का अवसर देता है. चुनाव की स्वतंत्रता उसका अपना क्षेत्र है. इस खचाखच भरी, भागती-दौड़ती मुंबई में हर व्यक्ति रफ्तार के साथ अकेला भी है और अपने फैसलों के लिए स्वतंत्र भी. चाहे तो वह इस भीड़ को अपना ले, इसका हिस्सा बन जाए या खुद को अलग कर एकाकी जीवन जी ले. जटिलताएँ, संघर्ष और सफलता जीवन के अंग हैं, जिन्हें अपनाना ही मुंबई को अपनाना है. जद्दोजहद के बाद पाया सुकून ही मुंबई का नशा है. यही वह कारण है कि जो एक बार इस शहर का रुख कर लेता है, उसे इसके बगैर जीवन फीका लगता है. गरीब से गरीब हो या अमीर से अमीर, मुंबई में रहना हर एक का सपना है. गगनचुंबी इमारतों में रहते लोग हों या पाइप में जीवन गुजारते लोग, मुंबई में जीना लोगों के लिए जैसे एक पैशन है, कुछ कर गुजरने के मौके की आस. लोग मुंबई को चकाचौंध का आकर्षण कहते हैं, जिसमें खुद के लिए बृहत्तर सपने की तलाश है.

प्रश्न 8. आपकी रचनाएँ हंस, नया ज्ञानोदय, पाखी, लमही, आजकल सहित अनेक साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं. लंबे समय से बदलते प्रकाशन माध्यमों को देखते हुए क्या आपको लगता है कि आज साहित्यकार के सामने पाठक तक पहुँचने के अवसर बढ़े हैं, या डिजिटल मंचों की अधिकता ने साहित्य की गंभीरता और पाठकीय धैर्य के सामने नई चुनौतियाँ भी खड़ी की हैं?
रीदारा:
कविता भेजने के लिए पत्रिकाओं का चुनाव मैंने कभी नहीं किया. जब भी जिस पत्रिका के संपादक या वरिष्ठों ने कविताएँ माँगीं, मैंने सहर्ष साभार दीं. इस तरह साहित्यिक वरिष्ठों के आशीर्वाद से मैं समृद्ध होती रही. आज डिजिटल माध्यमों से पाठकों तक पहुँचना जितना आसान है, उतना ही चुनौती भरा भी है. जितनी जल्दी अब पाठकों तक पहुँचना आसान है, उतनी ही जल्दी पाठकों द्वारा उन्हें भुला भी दिया जा सकता है. सोशल मीडिया द्वारा अपनी रचनाओं के माध्यम से पाठकों, संपादकों व प्रकाशकों तक पहुँचना भी आसान है. उनकी दृष्टि भी आसानी से नए कवियों या लेखकों पर पड़ती है. आज सोशल मीडिया एक आसान जरिया है, लेकिन उसकी अधिकता के चलते लेखन को कितनी गंभीरता से लिया जाएगा, यह संकट का विषय है. सोशल मीडिया की विश्वसनीयता संदिग्ध है. बहुत जल्द आपकी रचनाओं की नकल एवं दोहराव का खतरा बना रहता है. यही कारण है कि रचनाओं की चोरी के डर से कई कवि और लेखक सोशल मीडिया पर अपनी रचनाएँ डालना पसंद नहीं करते, बल्कि डालना ही नहीं चाहते. जो भी हो, हम इसे बदलते समय की चुनौती कह सकते हैं. यहाँ खुद को साबित कर अपनी अलहदा पहचान बनाना एक कठिन कर्म है, जिसमें सतर्क रहना और धीरज रखना बहुत जरूरी है.

प्रश्न 9. आपने कविता, कहानी, आलोचना और संपादन के साथ अनेक साहित्यिक मंचों पर कविता-पाठ और प्रपत्र-वाचन किया है. आपके खाते में कई प्रतिष्ठित सम्मान भी हैं. एक साहित्यकार के लिए सम्मान और पुरस्कार कितने महत्त्वपूर्ण हैं? क्या वे रचनात्मक ऊर्जा को नई दिशा देते हैं, या लेखक की असली कसौटी अंततः उसकी रचना और पाठकों के साथ उसका संबंध ही होता है?
रीदाराः
लेखन की कई विधाओं में लिखने के बावजूद अभी बहुत कुछ लिखना बाकी है. सही है कि सम्मान और पुरस्कार पहचान दिलाते हैं, लेकिन ये दोनों के हिस्से आते हैं. सम्मान और पुरस्कार देने और पाने वाले, दोनों सम्मानित होते हैं. यह बात अलग है कि नए पाठक उन लेखकों को पढ़ने का मन बनाते हैं, जो सम्मानित किए जाने की वजह से चिह्नित होते हैं. लेकिन जो नियमित पाठक हैं, वे जानते हैं कि कौन-सा लेखक या कवि क्या लिखता है. उसके विचार क्या हैं. वह किस मंच से जुड़ा है. उसकी वैचारिकता कैसी है. अमूमन साहित्यकार को उसी मंच पर बुलाया जाता है, जिसकी विचारधारा से उसके विचार मिलते हों. अगर सम्मानों को बतौर लालच या अपने लोगों को पेश करने के लिए दिया जा रहा है, तो यह गलत है. नए लेखकों को पहचान बनाने की जरूरत पड़ती है. पहचान बनाना एक धीरज माँगने वाली प्रक्रिया है. इसमें हड़बड़ी से नुकसान भी झेलना पड़ता है. एक बार पहचान बन जाए, तो सम्मान घर तक पहुँचते हैं. सम्मान और पुरस्कार अपना महत्त्व रखते हैं, लेकिन लेखनी की महत्ता के बगैर उनका कोई अस्तित्व नहीं. लेखक की असली कसौटी तो वह समाज, वह परिवेश है, जिसमें उसकी रचनाओं के महत्त्व को आँकने के कारण उन्हें पहचाना जाता है. आज के दौर में बेस्टसेलर होना भी अपने आप में एक अवॉर्ड है. लेकिन पुस्तक का सिर्फ ज्यादा मात्रा में बिक जाना उस पुस्तक के अच्छा होने का प्रमाण नहीं हो सकता. यह बात सिर्फ कहने की नहीं, बल्कि समझने वाली है. अच्छी पुस्तकों को पाठक ढूँढ़कर पढ़ते हैं.

प्रश्न 10. आपकी साहित्यिक यात्रा में कई पुस्तकें, विविध विधाएँ, संपादन और अकादमिक अध्ययन शामिल हैं. पीछे मुड़कर देखते हुए क्या कोई ऐसा विषय है, जिस पर आप अब तक लिखना चाहती थीं, लेकिन वह रचना अभी शेष है? और आज की युवा पीढ़ी, विशेषकर नई महिला लेखिकाओं को आप क्या कहना चाहेंगी, जो अपनी स्वतंत्र साहित्यिक पहचान बनाने की कोशिश कर रही हैं?
रीदाराः
पुनः कहना चाहूँगी, मेरा लिखना अभी पूरा नहीं हुआ, अधूरा है. वह संतुष्टि बाकी है, जिसके बाद लेखनी उठाने की जरूरत न पड़े. मेरे लेखन ने हर बार मेरी लिखने की प्यास बढ़ाई है. अनुभव तो यही है कि एक कवि या लेखक जितना लिखे, उतना ही परिष्कृत होता है. पीछे मुड़कर देखने पर लगता है, जैसे अभी तो बहुत कुछ लिखना बाकी है. ऐसा विषय, जिससे समाज में व्याप्त कुरीतियों और अंधश्रद्धा का पर्दा हटे तथा दमित और दलित (स्त्री/पुरुष) की स्थिति में सुधार हो, उस पर जरूर लिखना चाहूँगी. युवाओं से यही कहना चाहूँगी कि दिल से लिखिए. आपका लेखन आपके दिल, दिमाग, कल्पना, वैचारिक और आंतरिक व्यक्तित्व का मिला-जुला सामंजस्य होगा. किसी को पढ़कर या प्रभावित होकर लिखना आपकी पहचान नहीं बना सकता. खुद के अनुभव, नई दृष्टि, नई चेतना, कुछ अलग करने की चाह, निरंतरता और लगन आपको वह पहचान दिला सकती है, जिसे कोई खारिज नहीं कर पाएगा. लिखने के बाद अपने लिखे को खुद की कसौटी पर परखें. कोई वरिष्ठ आपको दिशा जरूर दिखा सकता है, लेकिन अपनी वैचारिकता को पहचान देना आपका अपना काम है.

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