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‘सुप्रसन्ना’ अवनि से अम्बर तक

वनगाँव की मिट्टी और मिथिला की सांस्कृतिक चेतना से लेकर जोधपुर की साहित्यिक दुनिया तक सुप्रसन्ना की यात्रा संस्कार, संवेदना और सृजन की कहानी है. हिन्दी और मैथिली में लेखन करने वाली सुप्रसन्ना से साहित्य, कविता, स्त्री-मन, लोकसंस्कृति और रचनात्मकता पर आत्मीय बातचीत.

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आम आदमी

आम आदमी

आम आदमी एक साधारण शब्द जरूर है, लेकिन उसके भीतर असाधारण हौसला, संवेदनशीलता, उम्मीद और इंसानियत छिपी होती है। यह कविता उसी आम आदमी के बड़प्पन को सलाम करती है।

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माता-पिता और गुरु के चरणों में नमन करती एक बेटी का भावपूर्ण चित्र

माता-पिता को वंदन

“प्रथम मेरे माता-पिता को वंदन” एक भावपूर्ण हिंदी कविता है, जिसमें कवयित्री ने अपने माता-पिता और प्रथम गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा, प्रेम और कृतज्ञता व्यक्त की है। बचपन की स्मृतियों, शिक्षा के संस्कार, गुरु के स्नेह और शिक्षिका बनने की प्रेरणा को अत्यंत सरल एवं हृदयस्पर्शी शब्दों में प्रस्तुत किया गया है। यह कविता हमें याद दिलाती है कि जीवन की हर सफलता के पीछे माता-पिता का त्याग और गुरु का आशीर्वाद सबसे बड़ी शक्ति होता है।

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ज्ञान का दीप जलाते हुए गुरुदेव, चरणों में नतमस्तक शिष्य, गुरु वंदना पर आधारित भक्ति भजन।

गुरु ज्ञान का दीप

“गुरुदेव तुम्हारा अभिनंदन” गुरु के प्रति श्रद्धा, समर्पण और कृतज्ञता से भरा एक भावपूर्ण हिंदी भजन है। इसमें गुरु को ज्ञान का दीप, जीवन का आधार और अज्ञान के अंधकार को दूर करने वाला मार्गदर्शक बताया गया है। यह भजन गुरु-शिष्य परंपरा की महिमा का सुंदर वर्णन करता है और गुरु पूर्णिमा, सत्संग तथा आध्यात्मिक आयोजनों के लिए उपयुक्त है।

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डेस्क पर बैठकर लेखन करती हुई भारतीय शिक्षिका और कवयित्री, सामने डायरी और पुस्तकें, साहित्यिक वातावरण में प्रेरणादायक व्यक्तित्व का चित्र।

दहलीज से साहित्य शिखर तक

माता-पिता के संस्कार, परिवार के सहयोग और दृढ़ आत्मविश्वास के बल पर साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने वाली शिक्षिका एवं कवयित्री की प्रेरक जीवन यात्रा। जानिए उनके लेखन, छंद साधना, संस्मरण प्रेम और सफलता के पीछे की कहानी।

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शब्दों की विहांगी : नीलम पेड़ीवाल

नीलम पेड़ीवाल “विहांगी” हिंदी साहित्य की एक सक्रिय और बहुआयामी रचनाकार हैं। इस विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपने साहित्यिक सफर, लेखन प्रेरणा, संघर्ष, उपलब्धियों और नए रचनाकारों के लिए महत्वपूर्ण संदेश साझा किए हैं।

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नारी केवल शब्द नहीं, मानवता की पहचान है |

नारी

नारी केवल शक्ति का प्रतीक नहीं, बल्कि ममता, त्याग, साहस, धैर्य और मानवता की पहचान है। यह कविता नारी के विविध रूपों और उसके अमूल्य योगदान को समर्पित है।

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आत्मविश्वास से खड़ी एक भारतीय महिला, हाथ में किताब और कलम लिए, स्वतंत्रता और आत्मसम्मान का प्रतीक भाव लिए हुए।

हाँ, मैं एक स्त्री हूँ…

यह कविता उस स्त्री की आवाज़ है जो समाज की परिभाषाओं से परे अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहती है। संघर्ष, आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी यह रचना स्त्री-अस्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।

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अंधेरे कमरे में खिड़की के पास बैठी एक उदास महिला, आँखों में आँसू और चेहरे पर दर्द की गहरी अभिव्यक्ति, बाहर बारिश का दृश्य

करुणा बन गई कमजोरी

यह कविता गहरे भावनात्मक घावों और टूटे हुए विश्वास की कहानी कहती है। इसमें एक ऐसे मन की पीड़ा झलकती है जिसने बार-बार ठोकरें खाकर यह सीखा कि अंधी करुणा और बिना सोचे समझे अपनापन देना स्वयं के लिए विनाशकारी हो सकता है। जीवन के कठोर अनुभवों ने उसे भीतर से मजबूत तो बनाया, लेकिन साथ ही उसके जज़्बातों पर एक स्थायी परत भी चढ़ा दी, जहाँ अब संवेदनाएँ नियंत्रित हैं और विश्वास सीमित।

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