दहलीज से साहित्य शिखर तक
माता-पिता के संस्कार, परिवार के सहयोग और दृढ़ आत्मविश्वास के बल पर साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने वाली शिक्षिका एवं कवयित्री की प्रेरक जीवन यात्रा। जानिए उनके लेखन, छंद साधना, संस्मरण प्रेम और सफलता के पीछे की कहानी।

माता-पिता के संस्कार, परिवार के सहयोग और दृढ़ आत्मविश्वास के बल पर साहित्य जगत में अपनी पहचान बनाने वाली शिक्षिका एवं कवयित्री की प्रेरक जीवन यात्रा। जानिए उनके लेखन, छंद साधना, संस्मरण प्रेम और सफलता के पीछे की कहानी।
नीलम पेड़ीवाल “विहांगी” हिंदी साहित्य की एक सक्रिय और बहुआयामी रचनाकार हैं। इस विशेष साक्षात्कार में उन्होंने अपने साहित्यिक सफर, लेखन प्रेरणा, संघर्ष, उपलब्धियों और नए रचनाकारों के लिए महत्वपूर्ण संदेश साझा किए हैं।
यह कविता उस स्त्री की आवाज़ है जो समाज की परिभाषाओं से परे अपनी पहचान खुद गढ़ना चाहती है। संघर्ष, आत्मविश्वास और स्वाभिमान से भरी यह रचना स्त्री-अस्तित्व की सशक्त अभिव्यक्ति है।
यह कविता गहरे भावनात्मक घावों और टूटे हुए विश्वास की कहानी कहती है। इसमें एक ऐसे मन की पीड़ा झलकती है जिसने बार-बार ठोकरें खाकर यह सीखा कि अंधी करुणा और बिना सोचे समझे अपनापन देना स्वयं के लिए विनाशकारी हो सकता है। जीवन के कठोर अनुभवों ने उसे भीतर से मजबूत तो बनाया, लेकिन साथ ही उसके जज़्बातों पर एक स्थायी परत भी चढ़ा दी, जहाँ अब संवेदनाएँ नियंत्रित हैं और विश्वास सीमित।
यह कविता आत्मा के परमात्मा में पूर्ण समर्पण की भावभूमि को अत्यंत सरल और मार्मिक शब्दों में व्यक्त करती है। इसमें भक्त और भगवान के बीच के उस गहरे, व्यक्तिगत संबंध को उकेरा गया है, जो किसी बाहरी आडंबर का मोहताज नहीं होता। कवि के लिए श्रीकृष्ण केवल आराध्य नहीं, बल्कि जीवन के हर भाव, हर संघर्ष और हर सत्य के आधार बन जाते हैं। श्रद्धा, वैराग्य और निष्काम भक्ति के माध्यम से यह रचना बताती है कि सच्चा समर्पण ही आत्मिक शांति और वास्तविक अस्तित्व का मार्ग है।
किताबों की खुशबू में एक ऐसा संसार बसता है, जहाँ शब्द नहीं, भावनाएँ बोलती हैं। साहित्य केवल अक्षरों का मेल नहीं, बल्कि आत्मा की आवाज़ है, जो हर युग में मन को छूती है। यह कभी भक्ति, कभी सत्य, तो कभी प्रेम और जीवन की गहराई बनकर हमारे भीतर उतरता है। अंधेरों में यही एक दीप बनकर राह दिखाता है और उलझनों में उत्तर बनकर सामने आता है। इसलिए किताबों से जुड़ना, दरअसल खुद से जुड़ना है क्योंकि साहित्य ही हमें इंसान बनने का सच्चा अर्थ सिखाता है।