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निर्बल व्यक्ति को सहारा देता हुआ इंसान, मानवता और करुणा का प्रतीक दृश्य

निर्बल की तुम ढाल बनना

निर्बल की तुम ढाल बनना एक प्रेरणादायक हिंदी कविता है जो मानवता, करुणा और सहानुभूति का संदेश देती है। यह रचना हमें सिखाती है कि जो कमजोर हैं, उन्हें सहारा देना और उनके आँसू पोंछना ही सच्ची इंसानियत है।

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प्रभु दर्शन की चाह में तड़पती आत्मा आकांक्षा कविता

आकांक्षा

“आकांक्षा” एक संवेदनशील भक्ति कविता है, जिसमें एक भक्त की प्रभु के साक्षात दर्शन पाने की गहरी तड़प और आत्मिक संवाद को बेहद मार्मिक शब्दों में व्यक्त किया गया है.

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साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. का महिदपुर रोड में भव्य मंगल प्रवेश

साध्वी शाश्वतप्रिया म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश

महिदपुर रोड में साध्वी श्री शाश्वतप्रिया जी म.सा. आदि ठाणा का भव्य मंगल प्रवेश। गुरुदेव जयघोष, धर्मसभा और रतलाम चातुर्मास निमंत्रण।

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रात के समय खिड़की के पास बैठा एक लेखक, कोरे काग़ज़ पर कलम से भावनाएँ लिखता हुआ

एहसासों का लावा…

लेखक केवल शब्द नहीं लिखता, वह अपने भीतर उमड़ते भावों को स्याही में घोलकर काग़ज़ पर उतारता है। कलम उसकी भावनाओं का वाहक बनती है और कोरा काग़ज़ अहसासों का सजीव संसार। यही लेखन श्रोताओं के दिल तक पहुँचकर अपनी अमिट छाप छोड़ देता है।

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महिला की गरिमा और मानसिक पीड़ा को दर्शाती सशक्त कविता, जिसमें बिना शारीरिक स्पर्श के की गई हिंसक दृष्टि और नजरों के अपराध को शब्दों के माध्यम से उजागर किया गया है.

देह नहीं, आत्मा का अपमान

यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.

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माँ : जो हर अक्स में खुदा

माँ जो बिना कहे हर दुख समेट लेती है और हर सुख में चुपचाप पास खड़ी रहती है। माँ की उपस्थिति यहाँ दूरी से परे, स्मृति और आत्मा में रची-बसी हुई है—ऐसी शक्ति जो कभी जुदा नहीं होती।

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ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

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स्त्री

प्रेम में डूबी स्त्री कभी नादान-सी लगती है, कभी इतनी कोमल कि जैसे स्पर्श से बिखर जाए। उसके भीतर सपनों की हलचल है. उमड़ती-घुमड़ती, तितर-बितर होती तमन्नाएँ। वह तितली-सी है, जिसे उड़ना तो है, आसमान को छूना भी है, पर उसके चारों ओर फैली दुनिया उसे फूलों के दायरे से बाहर जाने ही नहीं देती। आसमान ऊँचा है, अपने ही गर्व में अडिग; और ज़मीन पर खड़ी वह स्त्री अपने पंख फैलाने को तैयार होते हुए भी उड़ नहीं पाती।

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कभी-कभी गलतफ़हमी

कभी-कभी हमें भ्रम हो जाता है कि सामने वाला सच में प्यार करता है उसकी बातों में अपनापन दिखता है, इकरार के लम्हे भी सच्चे लगते हैं। वह गले लगकर समझने का दावा तो करता है, पर दुनिया के सामने वही समझ कमज़ोर पड़ जाती है और हमारी नासमझी गिनाई जाती है। मन जैसा चाहे वैसा प्यार दे भी दे, और इल्ज़ामों की बरसात भी उसी मन से कर दे तब रिश्ते बोझ बनते देर नहीं लगती।

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शब्दों में संवेदना का दरवाज़ा :”मुझ में भी रहता है इकतारा”

डॉ. तारा गुप्ता द्वारा लिखित गज़ल संग्रह मुझ में भी रहता है इकतारा दिल और दिमाग के बीच बहते उस पुल की तरह है, जिस पर चलते हुए पाठक जीवन, संवेदना, अनुभव और दर्शन सभी को साथ लेकर आगे बढ़ता है. कुल 70 ग़ज़लें, 36 मुक्तक और 35 दोहे इस संग्रह को विविधता से भरते हैं और पाठक को एकरसता से दूर रखते हैं.

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