बीच v/s साड़ी: राधानगर बीच पर हुआ एक मज़ेदार एहसास

वीर सावरकर एयरपोर्ट पर उतरते ही मेरे टूर ऑपरेटर का फ़ोन आ गया था. “मैम, पोर्ट ब्लेयर में आपका स्वागत है”, कहने के साथ ही उसने मुझे सारा यात्रा-विवरण समझाया. उसके बताए अनुसार मुझे अगले दिन फ़ेरी से हैवलॉक द्वीप के लिए निकलना था.
पोर्ट ब्लेयर से हैवलॉक तक का सफ़र अद्भुत था. दूर-दूर तक जहाँ निगाह जा रही थी, सिर्फ़ पानी ही पानी था और ऐसा नीला पानी अंडमान के अलावा शायद ही कहीं हो. समुद्र में उड़ती उड़न-मछलियाँ दिख रही थीं, जो बहुत तेज़ी से समुद्र से निकलकर लगभग दो किलोमीटर तक उड़कर, फिर उसी तेज़ी से समुद्र में समा जा रही थीं.
हैवलॉक में अपने होटल पहुँचकर मैं राधानगर बीच जाने के लिए तैयार होने लगी, जो एशिया के खूबसूरत समुद्रतट के रूप में जाना जाता है और यहाँ के सूर्यास्त का नज़ारा प्रसिद्ध है.
मैंने अपनी पसंदीदा चटख पीले रंग की साड़ी निकाली, जिस पर चाँदीले तारों की बारीक कढ़ाई थी. पूरे मनोयोग से तैयार हुई और पहुँच गई राधानगर बीच.
मैं वहाँ का अप्रतिम, नैसर्गिक सौंदर्य देखकर हैरान थी. ऊपर नीला आसमान, नीचे वैसा ही नीला समुद्र, साफ़-सुथरी, चमकती बारीक रेत. जितना सुना था, उससे कहीं ज़्यादा खूबसूरत पाया.
समुद्र की उठती-गिरती लहरों का लोग बेफ़िक्री से आनंद उठा रहे थे. मैं भी एक जगह खड़ी होकर आती-जाती लहरों को देखने लगी. तभी मुझे लहरों से निकलती, टू-पीस बिकिनी पहने एक लंबी-छरहरी युवती दिखी. मैं लगातार उसे घूरे जा रही थी, क्योंकि मैंने ऐसा दृश्य सिर्फ़ फ़िल्मों में ही देखा था. वह अपने में मगन जलक्रीड़ा कर रही थी.
थोड़ी देर बाद वह बाहर निकली. अब तक चार-छह जोड़ी और निगाहें भी उसे घूरने लगी थीं. अपने बाल झटकते हुए वह मेरे बगल से निकली, रेत पर पड़े हुए अपने कपड़े पहने और तीखी नज़रों से मुझे देखती हुई दूसरी तरफ़ चली गई.
अब मैंने देखा कि उसको घूरने वाली निगाहें मुझे घूरने लगी हैं. मुझे अपना घूरा जाना समझ में नहीं आ रहा था, क्योंकि मैंने तो साड़ी… ओह, साड़ी! तो मैं इस साड़ी की वजह से घूरी जा रही थी.
“और मैंने भी तो ये चटख पीली साड़ी ऐसे पहनी हुई थी, जैसे बीच पर नहीं, किसी मंदिर में बैठी हूँ!”

बीच पर साड़ी पहनकर अच्छा अनुभव हास्य पूर्ण रहा ।