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दिल की बात

दिल की बात हिंदी कविता
vijya dalmiya

विजया डालमिया, हैदराबाद

दिल की बात दिल ही जानता है,

कौन किसे अपना ख़ुदा मानता है।

बदलते मौसम के तेवर से
घर का हर कोना थर्राता है,
कमज़ोर हैं दिलों की दीवारें,
मेरी यह बात वो अच्छे से जानता है।

रोज़ एक नई शिकायत का
ख़तरा मंडराता है,
यूँ तो बातों की चाशनी में
जलेबी रोज़ ही उतारता है।

छोड़ दिया खुला अब ख़ुद को भी
भीगने के लिए,
देखें अब कौन-सा बादल
फटकर बरसात लाता है।

चाँद सारी रात उसके
आगोश में मचलता है,
आसमान मेरी आँखों में
रोज़ पिघलता है।

हम जिससे हैं बेख़बर,
ख़बर हमारी वो रखता है,
नींद में भी कोई मेरे
साथ-साथ चलता है।

उम्र बीत रही, मगर
समय वहीं थम जाता है,
आज भी जब कोई बड़े
प्यार से हमें पुकारता है।

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