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समर्पण

नृत्य मंच पर अपनी प्रतिभा दिखाती महिला परिवार की उपेक्षा के बीच अपनी प्रतिभा से पहचान बनाने वाली शकुंतला की प्रेरणादायक कहानी.

पूनम सिंह वत्सला, जमशेदपुर

समर्पण—कितना सुंदर शब्द है!
अर्थ है—अपने सुख, सुविधा और अहं को पीछे छोड़कर किसी के लिए स्वयं को अर्पित कर देना। शकुंतला ने भी अपना पूरा जीवन इसी समर्पण में लगा दिया था। मगर क्या कभी किसी ने उसके समर्पण को समझा?

शकुंतला सरल और सुलझे स्वभाव की थी। कम पढ़ी-लिखी थी, लेकिन स्वादिष्ट खाना बनाने और नृत्य करने में उसे महारत थी। शादी के बाद उसका संसार चार दीवारों के भीतर सिमट गया था।

बारह सदस्यों का बड़ा परिवार था। हर कोई अपने काम और दुनिया में व्यस्त था। शकुंतला सबकी पसंद-नापसंद का ध्यान रखती, सबकी जरूरतें पूरी करती और घर को सँभालती। बदले में उसे घर की सदस्य से अधिक नौकरानी समझा जाता।

पति अपने सपनों में व्यस्त रहते। बच्चे माँ की मौजूदगी को अपना अधिकार समझते और सास-ससुर की सेवा तो जैसे उसकी जिम्मेदारी ही थी।

फिर भी वह शिकायत नहीं करती।

उसके भीतर बस एक चीज़ जीवित थी—नृत्य।

जब भी थोड़ा समय मिलता, वह चुपचाप नृत्य करने लगती। उसके लिए नृत्य केवल शौक नहीं, अपने अस्तित्व को महसूस करने का एकमात्र रास्ता था।

घर में अगर कोई उसे सचमुच समझता था, तो वे थे बापूजी। वे उसकी प्रतिभा की कद्र करते और हर बार उसका हौसला बढ़ाते।

एक दिन बेटी के स्कूल में माँ-बेटी की नृत्य प्रतियोगिता की घोषणा हुई।

शकुंतला का मन खिल उठा। वर्षों बाद उसे घर की चारदीवारी से बाहर निकलने और मंच पर नृत्य करने का अवसर मिलने वाला था।

लेकिन बेटी खुश नहीं थी।

“माँ, तुम मेरे साथ स्कूल मत चलना। तुम न तो पढ़ी-लिखी हो, न स्टाइलिश। सब मेरा मज़ाक उड़ाएँगे।”

शकुंतला चुप रह गई।

फिर भी माँ तो माँ होती है। बेटी के आग्रह पर उसने अपने पुराने कपड़ों को सँवारा, खुद को थोड़ा आधुनिक बनाने की कोशिश की और उसके साथ स्कूल चल पड़ी।

शादी के बाद शायद वह पहली बार इतने आत्मविश्वास के साथ घर से बाहर निकली थी। उसे लग रहा था, जैसे किसी पिंजरे का दरवाज़ा खुल गया हो और वह पहली बार खुली हवा में साँस ले रही हो।

प्रतियोगिता शुरू हुई।

माँ-बेटी ने मंच पर कदम रखा और संगीत बज उठा।

शकुंतला जैसे बदल गई।

उसके कदमों में वर्षों का अभ्यास था, आँखों में भाव थे और चेहरे पर वह आत्मविश्वास था, जो उसे घर की चारदीवारी कभी नहीं दे पाई थी।

तालियाँ गूँज उठीं।

और परिणाम आया तो प्रथम पुरस्कार माँ-बेटी की जोड़ी को मिला।

बेटी ने कुछ क्षणों के लिए माँ को गले लगाया।

“थैंक यू, माँ।”

शकुंतला की आँखें भर आईं।

लेकिन यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिक सकी। कुछ ही देर बाद बेटी फिर अपने पुराने व्यवहार में लौट आई।

शकुंतला चुपचाप एक कोने में बैठ गई।

मन में सवाल उठा—

“क्या मेरे समर्पण में ही कोई कमी थी?”

वह सोचने लगी, “माँ बच्चों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर देती है, तो क्या बच्चे उसे थोड़ा-सा सम्मान भी नहीं दे सकते? वे क्यों भूल जाते हैं कि उनके जीवन की पहली वजह वही माँ है?”

तभी स्कूल की डांस प्रशिक्षक मिस ऐनी उसके पास आईं।

उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा—

“मैडम, आपकी परफॉर्मेंस लाजवाब थी। हमारे स्कूल में डांस टीचर की जगह खाली है। मैं चाहती हूँ कि आप हमारे साथ काम करें। प्लीज़, मना मत कीजिएगा।”

शकुंतला कुछ क्षण उन्हें देखती रह गई।

पीछे उसका पूरा परिवार स्तब्ध खड़ा था।

जिस प्रतिभा को घर में कभी महत्व नहीं मिला, आज वही प्रतिभा उसे सम्मान और पहचान दे रही थी।

उस दिन शकुंतला को समझ आया—

हर समर्पण का प्रतिफल घर से मिले, यह ज़रूरी नहीं।
कभी-कभी अपने भीतर की प्रतिभा के प्रति किया गया समर्पण ही इंसान को उसकी असली पहचान तक पहुँचाता है।

उसने पहली बार महसूस किया कि उसकी दुनिया उन चार दीवारों से कहीं बड़ी है।

One thought on “समर्पण

  1. हर समर्पण का प्रतिफल घर से मिले, यह ज़रूरी नहीं।
    कभी-कभी अपने भीतर की प्रतिभा के प्रति किया गया समर्पण ही इंसान को उसकी असली पहचान तक पहुँचाता है।
    बिल्कुल ठीक निष्कर्ष जिसे हर अर्थोपार्जन के लिए घर से बाहर जाने वाली विवाहित स्त्री ने जिया है।
    भारत में इन पुराने विचारों से घर-परिवार की ज़रूरतें पूरी नहीं हो पाती । अतः औरतों को घर से बाहर निकलकर कोई अर्थोपार्जन के लिए काम सीखकर करना ही चाहिए।

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