gulmohar
सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी अभिव्यक्ति और पहचान बनाती भारतीय महिला।

सोशल मीडिया पर वह

चारदीवारी में गुमसुम रहने वाली स्त्री जब सोशल मीडिया पर अपने शब्दों के सहारे बोलने लगती है, तो उसकी भावनाओं, प्रतिभा और अस्तित्व को नई पहचान मिलती है। छाया सीमा खंडागळे की यह कविता डिजिटल दुनिया में नारी की अभिव्यक्ति और आत्मविश्वास को रेखांकित करती है।

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त्रकारिता में आत्मसम्मान, कार्यस्थल की राजनीति और पेशेवर चुनौतियों को दर्शाता दृश्य।

मुन्ना से कीर्ति राणा-6

एक तरफ उज्जैन में ब्यूरो चीफ की जिम्मेदारी, दूसरी तरफ पांचवें रिपोर्टर के रूप में काम करने की चेतावनी। कीर्ति राणा के इस संस्मरण में पत्रकारिता की अंदरूनी राजनीति, बदलते व्यवहार और ग्वालियर तबादले की पेशकश के बीच लिए गए एक अहम फैसले की कहानी है।

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लेखिका रीता दास राम का साहित्यिक साक्षात्कार

जब कलम बोलती है…

नौवीं कक्षा से शुरू हुई रीता दास राम की साहित्यिक यात्रा कविता, कहानी, उपन्यास और संपादन तक फैली है। इस साक्षात्कार में उन्होंने साहित्य की सामाजिक जिम्मेदारी, स्त्री-अनुभवों और बदलते समय की चुनौतियों पर अपने विचार साझा किए हैं।

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बुरहानपुर की प्रतिभाशाली बच्चियों को उपलब्धियों के लिए सम्मानित करते हुए।

मेहनत की खुशबू से महका कारवाँ

बच्चों की मेहनत, प्रतिभा और सफलता जब गुरु के आशीष से जुड़ती है, तो हर उपलब्धि खास बन जाती है। सिद्धि के गीत, वैष्णवी का अभिनय, कियरा का नृत्य और आराध्या की चित्रकला को समर्पित यह कविता बच्चों के सपनों और उनकी जीत का उत्सव है।

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दशहरे पर शराब छोड़ने के बाद पिता का आशीर्वाद लेता बेटा

विजय

शराब की लत ने पवन से उसका मान-सम्मान छीन लिया था, लेकिन एक दिन उसने खुद को बदलने का संकल्प लिया। क्या परिवार का विश्वास फिर लौट पाएगा? पढ़िए बदलाव, उम्मीद और रिश्तों की मिठास से भरी लघुकथा ‘विजय’।

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दैनिक भास्कर में संपादक और रिपोर्टर के बीच संवाद को दर्शाता पुराने हिंदी समाचार कक्ष का दृश्य

मुन्ना से कीर्ति राणा

दैनिक भास्कर में बिताए वर्षों की कुछ यादें ऐसी हैं, जो एक संपादक के व्यक्तित्व के कई पहलुओं को सामने लाती हैं। श्रवण गर्ग के साथ खबरों पर तीखी बहस, रिपोर्टर की बेबाकी, कर्मचारियों के प्रति संवेदनशीलता और नाग-कोबरा वाला वह मजेदार प्रसंग न्यूज़रूम की एक अलग ही तस्वीर पेश करता है।

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अकेलेपन में पुरानी प्रेम यादों में खोया एक व्यक्ति

राख में भी तेरा आशियाना

कुछ रिश्ते ख़त्म होकर भी दिल से ख़त्म नहीं होते। उनकी यादें, उनकी ख़ुशबू और उनसे जुड़े सवाल बरसों बाद भी मन में बने रहते हैं। यह ग़ज़ल बिछड़ने के बाद भी प्रेम के शेष रह जाने और यादों के लगातार रिसते घावों की दास्तान है।

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एक-दूसरे की भावनाओं और इच्छाओं को समझते दो लोग

प्रेम में ‘मैं’ नहीं, ‘तुम’ भी ज़रूरी

हर रिश्ते में हम अपनी पसंद और इच्छाओं की बात करते हैं, लेकिन क्या कभी सामने वाले की चाहत के बारे में सोचते हैं? प्रेम और अपनापन तभी गहरा होता है, जब ‘मैं’ के साथ ‘तुम’ को भी बराबर जगह मिलती है।

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दादी के आँचल का सिरा पकड़े पार्क में चलती छोटी पोती

दादी का आँचल

अमिता श्रीवास्तव “दादी, हाथ कहाँ पोंछूँ?” मॉल के फूड कोर्ट में वॉफल खाकर चॉकलेट से सनी अपनी नन्हीं हथेलियाँ लिए अंबू मेरे सामने खड़ी थी। पाँच साल की अंबिका मेरी अंबू थी। “रुको, अभी रूमाल देती हूँ।” कहकर जैसे ही मैं अपना पर्स खोलने चली, उसने झट मेरे आँचल में अपनी हथेलियाँ पोंछ लीं। क्रीम…

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खिड़की के पास खड़ी दूरियों और अधूरे प्रेम में खोई एक स्त्री

मेरे साजन हैं उस पार…

कुछ दूरियाँ इतनी छोटी होती हैं कि उन्हें हथेलियों से मापा जा सकता है, लेकिन कुछ दूरियाँ उम्र भर समाप्त नहीं होतीं। ‘मेरे साजन हैं उस पार…’ अनकहे प्रेम, बिछोह, यादों और मन में रह गए अधूरे इंतज़ार की मार्मिक अभिव्यक्ति है।

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