
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
कुकू..! दरवाज़ा खोलो..!”
“क्यों आए हो? चले जाओ।”
“सुनो तो..!”
“कुछ नहीं सुनना मुझे। अब भी कुछ सुनना-सुनाना बाकी है क्या? मैं कहती हूँ, चले जाओ यहाँ से।”
“सुनो न… ज़रूरी बात करनी है, यार। बस एक बार दरवाज़ा तो खोलो..!”
“सुन रही हूँ मैं। जो बोलना है, बोलो..! मगर दरवाज़ा तो नहीं खुलेगा।”
“इतना भी क्या गुस्सा..! अच्छी बात है, मैं जा रहा हूँ… हमेशा के लिए यहाँ से दूर, बहुत दूर। एक आख़िरी बार मिलना चाहता था। खैर, कोई बात नहीं।”
खटाक..! दरवाज़ा खुला।
“क्या सच में चला गया..? बस इतना ही प्यार करता था?” बुदबुदाती हुई कुकू बरामदे से लगे खंभे पर ज़ोर से मुक्का मार बैठी।
“अरे… अरे..! क्या करती हो? देखो, कितना खून बह रहा है..!”
उसने उसकी खून से सनी उँगलियों को अपने मुँह से लगा लिया।
झटके से हाथ खींचकर अपनी दूसरी हथेली में दबाते हुए कुकू बोली,
“इससे तुम्हें क्या..? जिसके साथ घूम रहे थे, जाओ वहीं।”
“बहुत नाराज़ हो..?”
“मुझे क्या करना नाराज़ होकर।”
“अच्छा… तुम ही बताओ, क्या करता? दोस्त की बैचलर पार्टी थी। बहुत कोशिश की, मगर…!”
“दोस्तों का ख़याल है, उनके बुरा मानने की चिंता है… मेरी नहीं।”
मुँह फुलाकर कुकू ने चेहरा दूसरी ओर घुमा लिया।
वहीं सीढ़ियों पर दोनों बैठ गए।
उसके गोरे चेहरे पर चमकते पसीने को वह अपनी चुन्नी से पोंछने लगी।
दोनों की नज़रें आपस में मिलीं।
उसके होंठों पर मुस्कान और आँखों में क्षमायाचना झलक रही थी।
उसकी ठोड़ी को हल्के से ऊपर उठाकर, दुलार से वह बोला,
“ऐसा हो सकता है क्या..? देखो तो, क्या लाया हूँ..!”
लाल गुलाब को अपने होंठों से छूकर कुकू बोली,
“तुम्हारी इसी बात से मुझे गुस्सा आता है।”
“और तुम्हारे गुस्से पर मुझे आता है प्यार।”

तहेदिल से बहुत बहुत धन्यवाद आपको सुरेश जी 🙏🌹