
विजया डालमिया, हैदराबाद
.हैलो …कैसी हैं आप ?
… अच्छी हूँ कहिए! क्या काम है?
… काम तो कुछ नहीं। बस ऐसे ही मुझे किसी ने आपका नंबर दिया तो मैंने मिला लिया।
…. अच्छा! ठीक है।
दो दिन बाद फिर वही आवाज… हैलो कैसी हैं आप ?
…मैं बढ़िया! आप बोलिए कैसे याद किया?
… बस यूँ ही दिल ने चाहा कि आपकी आवाज सुनी जाए ।
…अच्छा तो सुन ली ना…. खिलखिलाते हुए उसने कहा…. अब रखिए फोन… सुनते ही फोन कट हो गया। अब तो यह अक्सर होने लगा। किसी भी वक्त वह फोन आ जाता। मुझे भी अच्छा लगने लगा। यूँ तो मेरे पास कइयों के फोन आते थे, पर सब किसी न किसी काम को लेकर होते थे। एक यही बंदा था जो सिर्फ मुझसे बात करने के लिए फोन करता था। धीरे-धीरे वह मेरे रुटीन में शामिल हो गया। पहले हमने इधर-उधर की बातें की। फिर हम इसकी-उसकी बातों पर उतर आए। बाद में हम अपनी बातें करने लगे। दुनिया भर की बातें जो खत्म होने का नाम ही नहीं लेती थी और जब शब्द खत्म हुए तो हम एहसासों से जुड़ गए। खूब महसूस किया एहसासों में एक दूसरे को हमने। सबसे कटकर एक अलग संसार बना लिया हमने। जब दो लोग आपस में जुड़ते हैं तो किसी तीसरे की गुंजाइश नहीं रहती और वही हो रहा था। अचानक एक दिन… एहसास खत्म हो गये या कहो एहसास बदल गए। समय बदल जाता है। मौसम बदल जाते हैं। दिन बदल जाते हैं। जज्बात बदल जाते हैं। बदलाव तो नियम है प्रकृति का… पर हम इस बदलाव को जल्दी से स्वीकार नहीं कर पाते। जितनी तेजी और मजबूती से वह मुझ में शामिल हुआ था उतनी ही तेजी से वह जुदा हो गया मुझसे और यही मैं सह नहीं पा रही थी। जब किसी मोड़ पर हम किसी से जुदा होते हैं तो कदम भले ही आगे बढ़ जाए… दिल तो वहीं छूट जाता है। बढ़ते कदमों के साथ दिन और रात बोझिल होने लगे। मुझे आदत पड़ गई थी उसकी बातों की। जिसे सुने बगैर मुझे ना नींद आती थी ना चैन। प्यार में एक दूसरे की बातें एक दूसरे के लिए टॉनिक कहो… दवा कहो या लोरी का काम करने लगती है। फिर दूसरी सब चीज बेअसर हो जाती है। जीना पड़ता है पर जिंदगी कहाँ रहती है। मैं हर पल ख्यालों में उसीसे बात करते रहती। सारी-सारी रात जागते हुए खुली आँखों से अपने पहले सपने को… पहली उम्मीद को टूटते हुए देखती और रात-रात भर रोते रहती। पूरे-पूरे दिन उसके कॉल का इंतजार करती मगर एहसास बदलने के बाद किसी पर कोई बात असर नहीं करती क्योंकि रिश्ते दम तोड़ चुके होते हैं ।कहीं और रिश्ते मजबूत हो जाते हैं और कहीं कमजोर पड़ जाते हैं।मैं हर रात भगवान से यही कहती कि… मेरी जिंदगी के अंधेरों की अब सुबह ना हो…. पर रोज सुबह होती।
और फिर एक दिन सुबह हुई पर मुक्ति के साथ। सांसे मुक्त होते हुए उसे भी हर रिश्ते से बरी कर गई। तभी मोबाइल बजा। आवाज आई…. हैलो…कैसी हैं आप ?
….आपने जिन्हें फोन किया है वे अब इस दुनिया में नहीं रही…. कहकर फोन कट हो गया। वह दास्तान जो “एक फोन कॉल “से शुरू हुई थी “एक फोन कॉल” पर आकर खत्म हो गई।
कुछ हकीकत
कुछ फसाना है
कुछ शब्दों का
ताना-बाना है…
