कब तक चलेगा ये सिलसिला…
प्रेम, दूरी और अधूरे जज़्बातों से सजी यह हिंदी कविता रिश्तों की खामोशियों, तड़प और अनकही बातों का भावपूर्ण चित्रण करती है।

प्रेम, दूरी और अधूरे जज़्बातों से सजी यह हिंदी कविता रिश्तों की खामोशियों, तड़प और अनकही बातों का भावपूर्ण चित्रण करती है।
प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि किसी की ख़ामोशी को समझ लेने का नाम है। सोशल मीडिया के इस दौर में रिश्ते जल्दी बन जाते हैं, लेकिन उन्हें खूबसूरत बनाए रखने के लिए प्रेम के साथ मर्यादा, सम्मान और संवेदनशीलता भी ज़रूरी है।
रात की खामोशी, अधूरी चाय और बालकनी में बैठा एक व्यक्ति जो एक ऐसी स्त्री को याद कर रहा है, जिसने उसे सिखाया कि सपनों को जिम्मेदारियों के बीच भी जिंदा रखा जा सकता है।
यह रचना उस मन की आवाज़ है जो केवल साथ नहीं, बल्कि ऐसा प्रेम चाहता है जो खामोशियों को भी समझ सके और बिखरी हुई रूह को अपना घर दे सके।
यह ग़ज़ल मुहब्बत के नाज़ुक और खूबसूरत एहसासों को बेहद सलीके से प्रस्तुत करती है। इसमें प्रिय के रूप, उसकी अदाओं और उसके प्रभाव को प्रकृति के बिंबों के माध्यम से उकेरा गया है—जहाँ नज़ारे शरमा जाते हैं, फूल मदहोश हो जाते हैं और हवाएँ भी बेखुद हो उठती हैं। शायर के लिए प्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि एक ऐसा आध्यात्मिक अनुभव है जो जीवन के सफर को उजालों और सुकून से भर देता है।
जब कोई मिलने आए, तो वह अधूरा नहीं, पूरा होकर आए—यही इस कविता का मूल भाव है। यह रचना बताती है कि आधे मन और बंटी हुई भावनाओं के साथ सच्चा समर्पण संभव नहीं होता। प्रेम तभी पूर्ण होता है, जब उसमें किसी प्रकार की कमी या विभाजन न हो।
स्वरा सुरेखा अग्रवाल (उत्तरप्रदेश) रिश्तों की डोर दोनों ओर से मजबूत होनी चाहिए। जितने ज़्यादा रिश्ते, उतनी डोर झुकेगी। रिश्तों की गति मद्धम होनी चाहिए, फास्ट नहीं, ज़रा स्लो रखिए। गर्माहट की तपिश स्निग्ध हो, पकड़ कोज़ी हो, चाशनी कम और कड़वाहट मनमोहक—यानी संतुलन ज़रूरी है। बांधिए भी उतना कि घुटन न हो, पकड़िए भी…
वह स्वयं को हर रूप में देखता है वामन, नरसिंह, माधव, नंदलाल एक ही सत्ता, अनेक लीलाएँ। और उसके सामने खड़ी है ‘कृष्ण प्रिया’, जिसकी पहचान केवल उसकी भक्ति है। ग्वालिन के वेश में, आँखों में प्रेम और अधरों पर पुकार लिए, वह बस इतना चाहती है कि कृष्ण नाम में खो जाए। उसके लिए वही तिलक है, वही श्रृंगार, वही जीवन। अंत में उसकी एक ही विनती रह जाती है. “जब मैं कहूँ… आओ न स्वामी, तो तुम आ जाना।”