इश्क़ का सुकून

चांदनी रात में फूलों से भरे बगीचे में नज़ाकत से चलती एक सुंदर स्त्री, चारों ओर महक और रोमांटिक वातावरण

दीप्ति अग्रवाल दीप

नज़ारे उन्हें देख शरमा रहे हैं,
चमन में नज़ाकत से जो आ रहे हैं।

मुहब्बत का इक गीत हम गा रहे हैं,
क़मर और तारे वो दोहरा रहे हैं।

मुसलसल झटकते हैं ज़ुल्फ़ें वो ऐसे,
घटाओं के दिल भी जले जा रहे हैं।

हर इक गुल है मदहोश उनकी महक से,
हवाओं के झोंके भी गश खा रहे हैं।

अलग सा नशा नाम में है सनम के,
लबों से उसी को छुए जा रहे हैं।

बहुत शुक्रिया हर घड़ी उस ख़ुदा का,
मुहब्बत की नेमत वो बरसा रहे हैं।

उजालों से रोशन सफ़र-ए-ज़ीस्त का ‘दीप’,
सुकूँ हर घड़ी आज हम पा रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *