
मधु मिश्रा
“अम्मा, आज बहू की पहली रसोई है… पता नहीं उसे बनाना आता भी है या नहीं। थोड़ी देर में बड़े भैया और मामा जी भी आने वाले हैं… क्या करूँ, मुझे तो चिंता हो रही है?” नंदिता ने धीमे स्वर में सास से कहा।
सासू माँ ने सहजता से उत्तर दिया, “इसमें चिंता कैसी? तुम ही थोड़ा मीठा हलवा बना लो, बहू से कह देना परोस देगी। हमारे पोते की बहू कलेक्टर है… पढ़ाई में ही लगी रही होगी, रसोई का काम उसे कहाँ आता होगा!” “ठीक है, माँ जी,” कहते हुए नंदिता रसोई की ओर बढ़ी। तभी उसने देखा बहू भी वहीं आ रही थी।
“मम्मी जी, पहली रसोई में क्या बनाना है? आप बता दें, मैं बना देती हूँ,” बहू ने कहा। नंदिता ठिठक गई “तु… तुम्हें बनाना आता है?”
“जी… थोड़ा-बहुत। क्या बनाना है, बताइए?”
“हलवा…” नंदिता के स्वर में अब भी आशंका थी।
“ठीक है, आप सूजी, घी और थोड़े काजू-बादाम दे दीजिए,” बहू ने सहजता से कहा।
नंदिता जैसे यंत्रवत-सी सामान निकालने लगी। कुछ ही देर में कढ़ाही में घी की खुशबू फैलने लगी। बहू नाप-तौल से, पूरे मन से हलवा बना रही थी।
नंदिता खुद को रोक न सकी “बेटा, तुम्हें सच में खाना बनाना आता है?”
बहू मुस्कुराई “मम्मी हमेशा कहती थीं, चाहे जितनी बड़ी अफसर बन जाओ, घर के काम तो आना ही चाहिए। इसलिए पढ़ाई के बाद उनके साथ हाथ बँटाया करती थी… बहुत अच्छा तो नहीं, पर थोड़ा-बहुत कर लेती हूँ। ”कुछ ही देर में सुनहरा, खुशबूदार हलवा तैयार था।नंदिता ने बहू की पीठ पर स्नेह से हाथ फेरा। शब्द जैसे कहीं खो गए थे… पर उस एक स्पर्श में स्वीकार, स्नेह और गर्व सब कुछ समा गया था।
सच ही कहा है, कभी-कभी जीवन की सबसे मीठी खुशियाँ
उम्मीद से बढ़कर मिलती हैं।
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प्यारी रचना 👌
सुंदर अभिव्यक्ति