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पल भर शेष

रात में तेज़ रोशनी से भ्रमित होकर काँच की खिड़कियों से टकराते पक्षियों को देखता एक बुज़ुर्ग व्यक्ति। पक्षियों को देखता एक बुज़ुर्ग व्यक्ति।

धारावाहिक कहानी का पहला भाग

निर्देश निधि

“मुन्ना, मुन्ना…” पिताजी चिल्ला रहे हैं। जिसका नाम वे पुकार रहे हैं, वह प्रत्युत्तर में “हाँ” कहने कभी नहीं आने वाला। फिर भी उन्होंने उसकी “हाँ” सुन ली है। वे ज़ोर-ज़ोर से बोल रहे हैं, “अरे, इन लड़कों को मना कर, मुन्ना। पटाखे क्यों छोड़ रहे हैं इतनी रात में? अरे, ज़रा देख तो, ये चिड़ियाँ कैसी फड़फड़ाकर अपने घोंसलों से निकल आई हैं। अरे, कोई इनके बारे में भी सोच लो, भाई।”

अम्मा, पिताजी के चिल्लाने से नाराज़ होकर कह रही हैं।

पिताजी क्या देख रहे हैं? अचानक बहुत-सी चिड़ियाँ उनके कमरे की तरफ़ साँय-साँय की आवाज़ करती हुई उड़ी चली आ रही हैं। सैकड़ों प्रजातियों की छोटी-बड़ी चिड़ियाँ—साइबेरियन चिड़िया, लाल मुँह वाले सारस, गौरैया, तोता, मैना, चील, बाज, बटेर, फ़ाल्कन, हॉर्नबिल, बत्तखें, पेंग्विन—सबके सब। हाँ, वहाँ डोडो भी है। और भी न जाने किन-किन प्रजातियों की चिड़ियाँ हैं।

पिताजी का कमरा फ़र्स्ट फ़्लोर पर है। उनके कमरे की दोनों दीवारों में बड़ी-बड़ी खिड़कियाँ हैं। वे खिड़कियाँ काँच की हैं और उनके कमरे का बाहर खुलने वाला दरवाज़ा भी काँच का ही है। यह क्या! इस सुनसान रात्रि में सारी दुनिया से आकर चिड़ियाँ पिताजी के कमरे की खिड़कियों में घुसने का प्रयास कर रही हैं। पिताजी हैरान हैं। वे आखिर ऐसा क्यों कर रही हैं?

खिड़कियों के शीशे बंद हैं। चिड़ियाँ खिड़कियों के शीशों से टकरा रही हैं। खिड़कियों से आते प्रकाश को वे दिन समझ रही हैं। उनके सिर गहरी चोट खा रहे हैं। वे या तो मूर्छित होकर या फिर मरकर नीचे गिरती जा रही हैं। वे बहुत भयभीत स्वरों में चिल्ला रही हैं। सवेरे-सवेरे कानों में अमृत-सा घोलने वाली उनकी मधुर स्वरलहरियाँ इस समय चीत्कार में परिवर्तित होकर भयभीत कर रही हैं।

पिताजी ने एक खिड़की खोल ली है। देखते-देखते उनका कमरा चिड़ियों के टूटे हुए पंखों से अट गया है। वे जगह-जगह हवा में तैर रहे हैं। पिताजी खिड़की से नीचे झाँक रहे हैं। खिड़कियों के नीचे मृत और मूर्छित चिड़ियों के ढेर हैं। कमरे के अंदर-बाहर सब जगह तेज़ प्रकाश है। रात में इन मासूम चिड़ियों के लिए इस कदर प्रकाश एक तरह का दिन है—रात में दिन। दिन चिड़ियों के दाना खाने और आवास खोजने का समय है। चिड़ियों का खिड़कियों पर आना दाना तलाशने के क्रम में हुआ है।

लाल गर्दन वाले सारसों का एक पूरा-का-पूरा झुंड पिताजी के कमरे में घुस आया है। प्रेमी और सरस प्रकृति के लाल मुँह वाले सारसों को देखना शुभ है, पर दिन में, रात में नहीं। रात पक्षियों के जागरण के लिए नहीं होती। समय शुभ-अशुभ का कारक अवश्य ही है।

देखते-देखते रात में पिताजी का कमरा लाल गर्दन वाले कुछ युवा और कुछ बूढ़े सारसों से भर गया है। अजीब-सा दृश्य है। वे आसमान की ओर अपनी चोंच उठाकर नृत्य कर रहे हैं, जैसे वे वर्षा ऋतु में करते हैं। यही नृत्य उनके एकनिष्ठ प्रणय का आरंभिक निवेदन भी होता है। कुछ बूढ़े सारस भी पिताजी के कमरे में प्रणय-नृत्य कर रहे हैं। अजीब डरावना दृश्य है। अपनी शतक भर की उम्र में पिताजी को पहली बार प्रणय-नृत्य जैसा नरम और रूमानी दृश्य डरावना लग रहा है।

यह क्या! उनमें से कुछ युवा सारस प्रणय-नृत्य छोड़कर पिताजी के बूढ़े और बिना बालों वाले सिर पर ज़ोर-ज़ोर से अपनी चोंच मार रहे हैं। पिताजी घबराकर उठ गए हैं। उठ ही नहीं गए, भागने की मुद्रा में हैं। वे ज़ोर से चिल्लाए हैं, “मुन्ना, मुन्ना, इन सारसों को भगा, मुन्ना। ये मेरा सिर फाड़ देंगे। ये मेरी जान ले लेंगे, मुन्ना। कोई मेरी नहीं सुनता। रोज़ कहता हूँ, इतनी लाइट्स मत जलाओ। रात को रात ही रहने दो। कोई नहीं सुनता।”

डरे हुए पिताजी बोलते जा रहे हैं। दिन भर के काम से थककर, गहरी नींद में सोए छोटे भैया उनके कमरे की ओर दौड़े हैं।

“सारस? सारस यहाँ कहाँ से आएँगे, पिताजी? यहाँ तो कोई सारस नहीं है।”

“अभी थे, अभी यही थे। देख, मेरी खोपड़ी पर ये निशान। ख़… ख़… खून छलक आया है।”

उनकी भर्राई हुई आवाज़ में हकलाहट और बढ़ गई है। घबराए हुए पिताजी पसीने-पसीने हो रहे हैं। नवंबर की ठंडी रात में उनकी माँस-रहित कनपटियों से पसीने की धार बह रही है। उनकी बूढ़ी, गड्ढों में सिमट आई आँखें भयभीत लग रही हैं। वे बुरी तरह काँप रहे हैं। उन्होंने हड्डी-हड्डी हो आए अपने दोनों हाथों से अपना सिर कसकर पकड़ रखा है। बुरे सपने अक्सर अपना ऐसा ही असर छोड़कर जाते हैं। पर पिताजी कह रहे हैं कि, “ये सपना नहीं है। ये सच है। मुन्ना की कसम।”

छोटे भैया पिताजी का सिर देखकर आश्चर्य में हैं। सिर पर खरोंच जैसे निशान तो वाक़ई हैं।

अम्मा ग़फलत में हैं। बड़बड़ाकर रमा को पुकार रही हैं, “अरी रमा, परकास कर दे ज़रा। अरी, परकास कर दे, रमा।”

अम्मा हमेशा से प्रकाश को “परकास” ही कहती हैं। इस उम्र में भी पिताजी, अम्मा पर ग़ुस्सा करने का अपना अधिकार बिल्कुल नहीं भूले हैं। आखिर सौ बरस पुराने पुरुष जो हैं।

पिताजी अम्मा पर ज़ोर से चिल्लाए हैं, “परकास कर दे, परकास कर दे… चिल्लाती रहती है, डुकरिया। चुप हो जा। कुछ पता भी है, कितना जानलेवा हो गया है तेरा परकास। तेरी आँख ही नहीं देखती बस। समझती नहीं है, अँधेरा कितना ज़रूरी हो गया है। अँधेरा न हुआ तो सब मारे जाएँगे, वो भी बेमौत। तू भी मारी जाएगी, बुढ़िया।”

“अच्छा ही तो होगा। अब कौन-सा क़िला फ़तह करना बाकी रहा?”

अम्मा ने कुछ ग़फलत में ही, बिना दाँतों वाले मुँह से निकली बच्चों जैसी हो आई आवाज़ में उत्तर दिया है। साथ ही वे हँसी भी हैं।

पिताजी और अम्मा एक ही कमरे में रहने वाले धरती के दो ध्रुवों के समान हैं। इस उम्र में भी पिताजी मौत को अम्मा और खुद से बहुत दूर खड़ी देख रहे हैं। यह इंसानी जीवट का एक बेहतरीन उदाहरण है, छोटे भैया मन ही मन सोच रहे हैं।

पिताजी के चिल्लाने से अम्मा की ग़फलत भी दूर हो गई है। वे बिना नींद वाली नींद से पूरी तरह जाग गई हैं।

“डिबिया जला दे, रमा। ज़रा परकास कर दे। देखिए, बुड्ढे कू किस ततैये ने काट खाया।”

अम्मा डाँट खाकर भी यही दोहरा रही हैं। वे पिताजी को “बुड्ढा” ही पुकारती हैं, जैसे स्वयं वे सोलह बरस की किशोरी हों। पिताजी भी तो चिढ़कर उन्हें “डुकरिया” या “बुढ़िया” ही पुकारते हैं, अपनी उम्र की तरफ़ देखे बगैर।

अधिक पककर मद्धम पड़ गई दो बूढ़ी आवाज़ों के कारण पूरा घर जाग गया है।

छोटे भैया कह रहे हैं, “हमें दिन भर काम करना होता है, पिताजी, और रात भर आप हमें सोने नहीं देते। आखिर क्या किया जाए? ज़रा हल भी आप ही बता दो।”

लेखिका के बारे में –


निर्देश निधि 
समकालीन हिंदी साहित्य की प्रतिष्ठित और बहुआयामी रचनाकार हैं। इतिहास में एम.फिल. शिक्षित निर्देश निधि ने कहानी, कविता, संस्मरण, यात्रा-संस्मरण, समसामयिक लेखन तथा पर्यावरण विषयक साहित्य में अपनी विशिष्ट पहचान बनाई है। उनकी रचनाएँ देश की लगभग सभी प्रमुख साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं तथा अनेक प्रतिष्ठित ई-पत्रिकाओं में निरंतर प्रकाशित होती रही हैं।उनके चर्चित कहानी-संग्रह ‘झाँनवाद्दन’ (जिसका संशोधित संस्करण ‘शेष विहार’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ), ‘सरोगेट मदर’, काव्य-संग्रह ‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ तथा संस्मरण-संग्रह ‘मोती से दिन’ पाठकों और समीक्षकों द्वारा समान रूप से सराहे गए हैं। ‘नदी नीलकंठ नहीं होती’ को साहित्य तक के ‘बुक कैफ़े’ में वर्ष 2023 की शीर्ष दस पुस्तकों में स्थान मिला तथा इसे जयपुर साहित्य संगीति सम्मान से भी सम्मानित किया गया। इस काव्य-संग्रह पर वर्तमान में शोध कार्य भी जारी है।

उनकी साहित्यिक उपलब्धियाँ अनेक आयामों में फैली हुई हैं। सीसीआरटी (भारत सरकार) की फ़ेलोशिप, ग्यारहवें विश्व हिंदी सम्मेलन (मॉरीशस) में भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में सहभागिता, हिंदी अकादमी (दिल्ली) द्वारा उनकी चर्चित कहानी ‘शेष विहार’ का नाट्य रूपांतरण, दूरदर्शन एवं आकाशवाणी से प्रसारण और साक्षात्कार, तथा ‘साहित्य तक’ जैसे राष्ट्रीय साहित्यिक मंचों पर सक्रिय उपस्थिति उनके सृजन की व्यापक स्वीकार्यता का प्रमाण हैं।

उनकी कहानियाँ और कविताएँ पंजाबी, बांग्ला, मराठी, भोजपुरी तथा अंग्रेज़ी में अनूदित हो चुकी हैं। ‘शेष विहार’ का मराठी अनुवाद भी प्रकाशित हो चुका है। उन्हें रमाकांत स्मृति कहानी पुरस्कार, कथारंग पुरस्कार, विटामिन ज़िंदगी प्रथम पुरस्कार, जयपुर साहित्य संगीति सम्मान, जनपद गौरव सम्मान, हिंदीश्री सम्मान सहित अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों और सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है। लेखन के साथ-साथ निर्देश निधि संपादन, रेखाचित्र निर्माण, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक सरोकारों तथा बच्चों की शिक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़े जनकल्याणकारी कार्यों में भी सक्रिय हैं। संवेदनशील दृष्टि, सामाजिक चेतना, मानवीय करुणा और प्रकृति के प्रति गहरी प्रतिबद्धता उनके लेखन की विशिष्ट पहचान है। उनकी रचनाएँ पाठक को केवल कथा का आनंद नहीं देतीं, बल्कि जीवन, समाज और मनुष्य के अंतर्मन से संवाद करने का अवसर भी प्रदान करती हैं।

3 thoughts on “पल भर शेष

  1. बेहद खूबसूरत ह्रदयस्पर्शी भावपूर्ण कहानी, लेखिका निर्देश निधि जी एवं संपादक सुरेश परिहार जी को हार्दिक बधाई एवं अशेष शुभकामनाएं 🌷🌷।

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