रात में तेज़ रोशनी से भ्रमित होकर काँच की खिड़कियों से टकराते पक्षियों को देखता एक बुज़ुर्ग व्यक्ति।

पल भर शेष

रात के सन्नाटे में एक बुज़ुर्ग पिता भयभीत होकर अपने दिवंगत बेटे को पुकारते हैं। उन्हें दिखाई देता है कि कृत्रिम रोशनी से भ्रमित होकर दुनिया भर के पक्षी उनके कमरे की ओर टूटे चले आ रहे हैं। यह केवल एक सपना नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ हमारे बढ़ते असंतुलन और प्रकाश प्रदूषण की भयावह चेतावनी है। संवेदनाओं, पर्यावरण और मानवीय रिश्तों को छूती यह कहानी पाठक को अंत तक बाँधे रखती है।

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