तोहमत लगा दीजिए

बारिश भरी शाम में खिड़की के पास बैठा एक व्यक्ति डायरी में भावुक शायरी लिखता हुआ दिखाई दे रहा है, पास में जलती मोमबत्ती और वातावरण में प्रेम, शिकायत और अपनत्व की गहरी भावनाएं महसूस हो रही हैं।

स्मृति मिश्रा रीति, जगदलपुर (छत्तीसगढ़)

मेरा दामन बहुत साफ़ है,
कोई तोहमत लगा दीजिए॥

गलतियाँ हो भी जाएँ अगर,
मुस्कुराकर सज़ा दीजिए॥

बहके-बहके कदम हैं हमारे,
प्यार से फिर बुला लीजिए॥

वास्ता इश्क़ से है हमें,
ज़िंदगी से दुआ कीजिए॥

रहनुमा बनकर शामिल रहो,
इश्क़ फिर से नया कीजिए॥

आसरा आपसे है हमें,
दिल से दिल को मिला लीजिए॥

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5 thoughts on “तोहमत लगा दीजिए

  1. बहुत ही सुंदर ग़ज़ल स्मृति जी 👏🏼👏🏼👏🏼

    1. सुंदर अभिव्यक्ति अच्छी शब्द रचना ।

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