तोहमत लगा दीजिए
“तोहमत लगा दीजिए” प्रेम, शिकायत और अपनत्व की भावनाओं से सजी एक नाज़ुक ग़ज़ल है, जिसमें रिश्तों की मिठास और दिल की गहराइयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।

“तोहमत लगा दीजिए” प्रेम, शिकायत और अपनत्व की भावनाओं से सजी एक नाज़ुक ग़ज़ल है, जिसमें रिश्तों की मिठास और दिल की गहराइयों को खूबसूरती से व्यक्त किया गया है।
यह ग़ज़ल इश्क़ की तड़प, जज़्बातों के छल और सत्ता की विडंबना को एक साथ समेटती है। शमा, परवाना, कफ़न और मयखाने जैसे प्रतीकों के माध्यम से कवि ने दर्द और दौर-ए-वक़्त का सटीक चित्र खींचा है।
दायरे सिमटते रहे और दूरियाँ बढ़ती रहीं।
हर रोज़ खुद को तराशते गए, फिर भी कमियाँ निकलती रहीं। उसके बदले हुए लहजे तीर बनकर लगे,और हम हर गिरावट के बाद हुनर से फिर सँभलते रहे।
कुछ पतों के पते कभी मिलते नहीं, और कुछ खतों के जवाब लौटकर नहीं आते। ये कविता अधूरी मोहब्बत, अनकहे जज़्बात और खामोश इंतज़ार की एक सजीव तस्वीर पेश करती है—जहाँ भावनाएं शब्दों से कहीं ज़्यादा कह जाती हैं।