
सरिता इस्टवाल ‘अपराजिता’
खुद को पाया, खुद को ही खोकर,
लगी सफ़र में भले ही ठोकर।
बैठे नहीं कभी हम हार मानकर,
संघर्ष किया हमने जीवन भर।
संभाला है ख़ुद को ठोकर खाकर,
पैर लहूलुहान हुए काँटों से मगर।
चलते रहे फिर भी मुस्कुराकर,
मुड़ गया रुख़ तूफ़ानों का हार मानकर।
छला ज़माने ने कदम-कदम पर,
हौसला रखा बुलंद, मानी न हार।
परिस्थितियों से हुई सदा तकरार,
किया हार को भी सहर्ष स्वीकार।
मुस्कुराते रहे सदा दर्द को पाकर,
मंज़िल को पाया काँटों पर चलकर।
चले वक़्त के साथ कदम मिलाकर,
गिरे औंधे मुँह भी मंज़िल पर आकर।
नई चुनौती मिली हमको हर मोड़ पर,
नहीं बैठे मगर कभी भी घबराकर।
झंझावातों और तूफ़ानों के थपेड़े सहकर,
खुद को पाया, खुद को ही खोकर।
इन रचनाओं को भी पढ़ें-
अधूरी मुलाक़ात
अमर मित्रता
मेरी ताक़त, मेरे दोस्त
अनुपमा जैसी दोस्त ने मुझे बनाया लेखिका
दोस्ती की वह छांव, जहां पूरा मोहल्ला एक परिवार बन गया
कुछ मित्र जीवन होते हैं
“तेरे बिना ज़िंदगी से कोई शिकवा तो नहीं…”

One thought on “खुद को पाया, खुद को ही खोकर”