
सवितासिंह मीरा, जमशेदपुर
जहां दो तरफा ज़िंदगी वेंटिलेटर पर होती है।
आईसीयू का वो बंद दरवाज़ा… जिसके अंदर मशीनों की बीप-बीप है और बाहर अपनों की थमी हुई सांसें।
अक्सर हमें लगता है कि दर्द सिर्फ अंदर लेटे मरीज को है, पर सच तो यह है कि उस कांच के पार घिरा इंसान सिर्फ शारीरिक कष्ट से नहीं लड़ रहा होता।
अगर वो एक मां, पिता, भाई या जीवनसाथी है, तो उसे अपने शरीर की सुइयों से ज़्यादा बाहर बैठे अपनों की तड़प रुलाती है। वो भीतर लेटे-लेटे महसूस कर सकता है कि उसके इस दर्द से बाहर उसके परिवार का कलेजा छलनी हो रहा होगा। मरीज खुद से ज़्यादा अपनों की खातिर जीने के लिए संघर्ष करता है।
और उधर, उस ठंडे गलियारे में परिजनों का पल-पल सदियों जैसा बीतता है। दरवाज़ा जब भी खुलता है, पैरों की हर आहट पर दिल बैठ जाता है कि, “अब क्या संदेश आएगा?” प्राण जैसे गले में आकर अटक जाते हैं।
यह एक ऐसी रूह को झकझोर देने वाली दोतरफा पीड़ा है, जहां अंदर शरीर छटपटाता है और बाहर अपनों की आत्मा तड़पती है।
ईश्वर यह जानलेवा इंतज़ार और बेबसी कभी किसी को न दिखाए।
