
ममता सिंह देवा
शाम को अक्सर अस्सी घाट पहुँच जाती शिवानी। घाट की सीढ़ियों पर बैठकर एक हाजमोला-नींबू वाली चाय और चटपटी मिर्चों वाला चनाजोर बनवाकर जिह्वा के माध्यम से आनंद लेती। चनाजोर उसको बहुत पसंद था और हाजमोला वाली चाय वाले तो भरे हुए हैं घाट पर। अगर किसी ख़ास की चाय पसंद है तो मोबाइल किसलिए है? मिनटों में आपके सामने दाँत निकालकर जनाब हाज़िर हैं।
तरह-तरह के लोग, रंग-बिरंगे कपड़े, खाने-पीने की न जाने कितनी दुकानें… हमेशा मेले जैसा माहौल रहता वहाँ का। मोदी जी ने अस्सी घाट का कायाकल्प क्या किया कि रोज़ त्योहार ही मनता है। शिवानी वहाँ बैठे अपने पुराने घाट को ढूँढ़ती, जब कुछ कलाकारों के अलावा कोई नहीं आता था। कलाकार स्केचिंग करते, नॉर्मल दूध वाली चाय पीते। बहुत शांति होती थी उस वक्त।
पर्यटन की नज़र से तो बहुत अच्छा था, लेकिन पर्सनल नज़रिए से कलाकारों की प्राइवेसी में भीड़ की दखलअंदाज़ी खटकती थी। इस बात को लेकर शिवानी थोड़ी स्वार्थी थी।
आज भी चाय पीते हुए उसी विकलांग औरत को देख रही थी। स्वाभिमान से भरी हुई वह एक टांग पर अपनी बैसाखियों को सीढ़ियों पर टिका, वहीं बैठ जाती और एक फोल्डिंग टेबल पर एक बर्नर वाला छोटे सिलेंडर का चूल्हा, मैगी के पैकेट्स, मैगी बनाने के लिए पैन, कुल्हड़, लकड़ी के चम्मच, पानी की ढक्कन वाली बाल्टी और उसके तीन साल के अपंग बेटे के साथ (शायद वंशानुगत बीमारी थी) सब कुछ उसके हाथ की पहुँच के अंदर रखकर एक लड़का (भाई या रिश्तेदार) चला जाता।
उसका बेटा हाथों के सहारे सीढ़ियों पर कुछ दूरी तक टहल आता। बच्चों को ललचाई आँखों से खेलते हुए देखता। आज भी बैठे हुए बच्चों को देख रहा था कि उनकी बॉल उसकी तरफ आ गई और उसने पकड़ लिया। बाल मन, बॉल को देखकर खेलने का मन किया। उसने बॉल को ज़मीन पर दो-तीन टप्पे खिलाकर हाथ में पकड़ा और उन खेल रहे बच्चों की तरफ उछालने जा ही रहा था कि उनमें से एक लड़के ने आकर उसे एक झन्नाटेदार झापड़ रसीद कर दिया।
“अबे लंगड़े! तेरी हिम्मत कैसे हुई हमारी बॉल से खेलने की?”
छोटा बच्चा अपना गाल सहलाकर रोने लगा और लड़के भी आकर उसको घेरकर खड़े हो गए। बच्चा डरकर सहमा हुआ था। लड़कों ने उसको तंग करना शुरू कर दिया। ये देख शिवानी उठकर उधर की तरफ दौड़ी। तभी उसने देखा, बच्चे की माँ चिल्लाते हुए कह रही थी…
“एकदम दूर रहत जा तू सबहिन, नाहीं त…”
ये बोल उसने अपनी एक बैसाखी उन लड़कों की तरफ मारने की मुद्रा में उठा ली। लड़कों ने इस बात की कल्पना नहीं की थी। उसका चंडी रूप और बढ़ती भीड़ को देख लड़के चुपके से खिसक लिए।
शिवानी को कुछ करने की ज़रूरत नहीं थी। एक माँ दुर्गा के संहारक रूप में अपने बेटे के पास खड़ी थी।
शिवानी पलटकर वहीं कुछ दूरी पर खिलौनों की दुकान से एक बॉल खरीदकर उस बच्चे को पकड़ा। फिर एक और चाय के ऑर्डर करने के लिए मोबाइल निकाला और सीढ़ियों पर बैठकर बोली—
“एक मैगी मेरे लिए भी… मक्खन थोड़ा ज़्यादा डालना।”
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बच्चों की सुरक्षा के लिए वह हमेशा मां चंडी की तरह तैयार रहती है।
Thank you Parul 😍
बहुत ही सुंदर….. माँ तो माँ होती है
Thank you ANONYMOUS 😍
बेहद उम्दा कहानी
Thank you ANONYMOUS 😍
Well written
Thank you ARYA 😍