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ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं

पुश्तैनी घर के आँगन में लौटता रवि और ख़ामोश दीवारें ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं — भाग 2

रीता मिश्रा तिवारी की लंबी कहानी का दूसरा भाग

reeta mishra

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर

आसमान पर सूरज का साम्राज्य फैल चुका था।

पशुओं का झुंड चारे की तलाश में हरी घास और गेट खुला देखा तो अंदर आकर दावत उड़ाने लगे।

पक्षियों की चहचहाहट एक मधुर संगीत की तरह मेरे कानों में शहद की तरह घुल गई।

सर्द बयार सरररर से गालों को छूकर झरोखे से बाहर निकल गई।

मैंने पलकें झपकाईं और आँखें खोलीं। मोबाइल देखा तो…

“अरे बाप रे! आठ बज गए। डैडी के इतने सारे मिस कॉल!”

डैडी से बात कर मैं बरामदे में आकर सोचने लगा।

बरसों से सूने पड़े इस घर के आँगन में कभी खुशियाँ हिलोरें मारती होंगी।

आँगन का गुलमोहर, जिस पर चिड़ियाँ कभी अपना बसेरा डालती थीं। उसके झड़े हुए फूलों से बच्चे होली खेलते थे और अब वह उदास खड़ा है।

गुलमोहर इस आस में रहा कि कभी तो कोई आएगा।

इस आँगन में फिर से चहल-पहल, हँसी-ठिठोली और खुशियों की महक होगी।

तभी तो अपने ऊपर पत्तियों और फूलों को आने से कभी रोका नहीं उसने।

अपने नीचे झड़े सूखे फूलों का एक बिस्तर-सा बना रखा है कि बच्चे आएँगे, खेलेंगे तो उन्हें चोट नहीं लगेगी।

आँगन की तुलसी कभी लहलहाती थी, अब सूखकर काँटा बन गई है।

मैं चारों तरफ देखता, धीरे-धीरे चलता हुआ आँगन में आकर खड़ा हो गया।

गहरे सुकून और शांति का अहसास, जैसे बाहरी दुनिया के कोलाहल से दूर मंदिर में बैठकर आत्मशांति मिलती है।

अक्सर हम सोचते हैं कि खामोशी के पीछे हम अपने दुःख-दर्द को छुपा लेते हैं। किंतु ये दीवारें चुप नहीं रहतीं, चीख-चीखकर गुजरी दास्ताँ बयाँ करती हैं।

अपनों के बीच की दूरियों को मिटाने की कोशिश में हर उस चाबी का उपयोग करती हैं, जो प्रेम से बनी है, ताकि दिल के दरवाजे पर लगा बंद ताला खुल जाए।

वह थकती नहीं, कभी हारती नहीं है।

जर्जर दीवारें, कमज़ोर छत बरसों से तन्हाई की चादर ओढ़े खड़ी रहती हैं, एक आहट के इंतज़ार में।

यह सन्नाटा किसी शोर से ज्यादा तकलीफदेह और भयावह होता है, जिसे मैं आज महसूस कर रहा था।

मैं उन पलों की कल्पना करने लगा।

यहाँ बैठकर दादू सुबह-शाम चाय पीते होंगे।

दोस्तों संग उनकी मजलिस जमती होगी और दीदा रोज़ उन हुजूम को चाय-नाश्ता कराती होंगी।

तुलसी की पूजा करती होंगी और पापा…

पापा इसी आँगन में गुलमोहर के नीचे खेलकर बड़े हुए होंगे।

मेरा बचपन भी तो इसी आँगन में गुलमोहर तले, उसके फूलों संग खेलते, दीदा का आँचल पकड़े, तुलसी की परिक्रमा करते बीता है।

उन दिनों कितनी रौनकें और खुशहाली हुआ करती थी।

बरामदे के एक कोने में टूटा चूल्हा बताने लगा…

“किस तरह तुम्हारी माँ यहाँ लकड़ी के धुएँ में अपने सपनों को उड़ाकर स्वादिष्ट खाना बनाती थी। खूब तारीफ होती थी। तुम्हारे पापा उसके कपड़ों से आती धुएँ, तेल की गंध और हाथों से मसालों की महक के कारण हिकारत से देखते, उपेक्षा करते थे। फिर एक दिन सब छोड़कर अमेरिका चले गए।”

यादें साझा करते उसकी आँखें गीली थीं।

“तू तो दूध पीता बच्चा था। बरसों इंतज़ार किया उस देवी ने। जुदाई उसे खोखला कर दिया। उसके मरने के बाद तेरा बाप आया और तुझे ले गया…!”

“गाँव के परिवेश में बिगड़ जाएगा कहकर…!”

तेरे दादाजी गिड़गिड़ाते रहे, दादी बिलखती रही।

फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा उसने।

“अब प्रश्न ये है कि अपने बाप के कहने पर तू इस धरोहर को बेचने आया है या…?”

चूल्हे ने अपनी आशंका जताई।

बरामदे की दीवार पर परदादा की धूल भरी तस्वीर को साफ करके, सजल नेत्रों से हाथ जोड़कर मैंने कहा-

“नहीं, नहीं… बेचने नहीं। मैं हमेशा के लिए अपने दादा-परदादाजी की विरासत, जो उन्होंने अपनी जी-तोड़ मेहनत से बनाई है, उसे सहेजने आया हूँ।”

तभी ऐसा एहसास हुआ, जैसे किसी ने मुझे आवाज़ दी

“बेटा रवि..! पीछे जाकर देख तो सही, आम और लीची का पेड़ है भी या..! नारियल और सुपारी जाने किस अवस्था में हैं…!”

भागता हुआ मैं कोठी के पीछे गया।

एक अजीब सुकून और खुशी से मेरा चेहरा खिल गया।

फलों से भरा पेड़ खुशी से ऐसे झूम रहा था, जैसे उसे विश्वास था कि विरासत को सँभालने कोई है, जो अवश्य आएगा।

शायद इसीलिए मेरे स्वागत में उसने दो-चार फल जमीन पर गिरा दिए।

मन को मैंने कहा—

“सच है, घर ख़ामोश है, किंतु दीवारें बोलती हैं।”

One thought on “ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं

  1. बहुत सुंदर भावपूर्ण कहानी है।

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