रीता मिश्रा तिवारी की लंबी कहानी का तीसरा भाग

रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
मैं अभी फलों को चुन ही रहा था कि “बेटा” संबोधन ने मुझे चौंका दिया।
“बेटा… सालभर पहले… तू मोहन का…”
“जी, मैं ही आया था और वो मेरे डैडी हैं।”
“कहीं तू…!”
“जैसा आप सोच रहे हैं, वैसा कुछ भी नहीं है।
दादू से वादा करके गया था मैं कि हमेशा के लिए आकर उनके साथ ही रहूँगा। आने में ज़रा देर हो गई और दादू का इंतज़ार दम तोड़ दिया।”
“दम तोड़ा नहीं, साधे बैठे हैं…”
“क्या मतलब?”
“यही कि… मेरे घर पर हैं। बहुत बीमार थे। चाहते थे यहीं रहें, पर बीमार अवस्था में उन्हें अकेला कैसे छोड़ देता? तो हमारे साथ हैं।”
“सोच-सोचकर मैं… खुद को धिक्कार रहा था। बहुत धन्यवाद आपको।”
“तुम्हारे पा… पा…?”
“गाँव और यहाँ की ज़िंदगी पसंद नहीं उन्हें। अपनी जगह-जमीन, विरासत का कोई लालच नहीं है। यहाँ तक कि अपने जन्मदाता से मोह, प्यार कुछ भी नहीं।”
“तुझे कैसे याद रहा, बेटा…?”
“एक साल पहले कंपनी के एक प्रोजेक्ट के सिलसिले में यहाँ, भारत में पटना शहर में आना हुआ।
बचपन की कुछ धुंधली यादें थीं। डैडी कभी कुछ बताते नहीं थे।
जब मेरा भारत आना सुना तो शायद उनके दिल में कुछ कसक थी।
गाँव का नाम और थोड़ी-बहुत जानकारी मुझे दे दी।
उन्हें ये तक नहीं पता था कि दीदा-दादू ज़िंदा हैं भी या नहीं।
जब पूछा उनका गुज़ारा कैसे होता है तो कहे…
‘पैसे भेजता था, फिर बहुत सालों बाद एक दिन पैसा वापस आ गया तो…!’
“आपने कभी जानने की कोशिश नहीं की…?”
इस बात का उनके पास कोई जवाब नहीं था।
यहाँ गाँव आकर मुझे पता चला, बेटे-पोते के इंतज़ार में इंतज़ार करते-करते दीदा स्वर्ग सिधार गईं, पर दादू ज़िंदा हैं, जिनकी आँखें कमजोर और शरीर दुर्बल हो गया है। हाथ काँपते हैं उनके।
जब मैं यहाँ आया तो वो वहाँ बरामदे में आरामकुर्सी पर बैठे, फूलों से भरे आँगन में खड़े इस गुलमोहर को निहार रहे थे। कुछ बुदबुदा भी रहे थे…!”
“क्या…?”
“यही कि उम्मीद है, वो दिन आएगा। यहाँ की मिट्टी उसे खींच लाएगी। जिस तरह चौखट लाँघकर गया था, उसी तरह फलाँगकर आएगा। तब तक मिट्टी के सिवा कुछ नहीं मिलेगा, सिर्फ़ जर्जर दीवारें मिलेंगी…!”
मेरा परिचय जानकर मुझे देखकर अति प्रसन्न हुए थे।
गले से लगाए रखा था। अपनी भर्राई आवाज़ में मेरी बचपन की कहानी, मेरी शरारतें सुना रहे थे। नौकरों को मेरी पसंद का खाना-नाश्ता बनाने का आदेश दे रहे थे, जैसे उन्हें पहले से पता हो कि मुझे क्या पसंद है।
महीना भर मैं उनके साथ रहा, उनकी खूब सेवा की।
मेरे लौटने के वक्त वो मुरझा गए। पहली बार उनके मुँह से डैडी का नाम सुना मैंने…
“तू भी मोहन की तरह वापस नहीं आएगा।”
“ऐसा नहीं है, दादू… बस आप कुछ दिन इंतज़ार करो।”
“मोहन भी यही कहकर गया था, कुछ दिन इंतज़ार करो बाबा…
एक बार रवि का वहाँ स्कूल में दाखिला हो जाए, फिर आप और अम्मा, हम सब साथ रहेंगे।”
“दादू..! मैं वादा करता हूँ, हमेशा के लिए आपके साथ रहने वापस आऊँगा..!”
उन्होंने मुझे ये भी कहा था…
“बेटा..! डॉलर तो मैं नहीं दे सकता, सिवाय आशीर्वाद के..!”
मेरी हथेली पर सौ रुपए का एक बंडल रख दिया। उन रुपयों को मैंने खर्च नहीं किया। हमेशा अपने साथ रखता हूँ।”
“बेटा..! बड़ी तसल्ली हुई और खुशी भी… तुम्हारी भावना और विचार जानकर अच्छा लगा..!”
“समय के साथ भले ही लोग दूर हो जाते हैं, परंतु दिल… मिट्टी की महक और जड़ों से जुड़े होते हैं।
आप दादू के मित्र हैं शायद, तो आपको मैं बाबा..”
“हाँ बेटा, ज़रूर..! चलो, तुम्हें तुम्हारे दादू से मिलवाते हैं..!”
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बहुत बढ़िया कविता 👌