
निधि सिंह
आधी रात के इस अल्हड़पन को
जलाने आई हूँ।
आई हूँ कि ये सन्नाटा रात का
दिमाग़ की नसों को
कर देता है क्षत-विक्षत।
दिलों-दिमाग़ को चीरकर
रख देने वाली
इस शांति को
जलाने आई हूँ।
चुभती है ये शांति,
चाँद रात की किरणें
भेद जाती हैं अंतर्मन को।
ये रात का सूनापन
खूँखार भेड़िये की याद दिलाता है,
जो नोच डालते हैं शरीर को,
चूस जाते हैं शरीर का सारा लहू,
जिसे देख काँपते हैं
ये घरों में बैठे लोग।
रात को जलाने आई हूँ,
कि चुभती है ख़ामोशी,
चुभता है सन्नाटा।
रात के सन्नाटे से
कानों से रिसता है ख़ून।
जलाने आई हूँ
इस रात को,
इस सन्नाटे को।
