
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
सान्वी ने बहुत पहले ही अपने दिल के चारों ओर एक अदृश्य दीवार खड़ी कर ली थी।
उसने खुद को दुनिया से नहीं, लेकिन अपनी भावनाओं से ज़रूर दूर कर लिया था। वह लोगों से मिलती थी, मुस्कुराती थी, अपने काम करती थी, लेकिन किसी को अपने दिल तक पहुँचने की इजाज़त नहीं देती थी।
वह जान चुकी थी कि रिश्ते खत्म होने का दर्द उतना नहीं होता, जितना उम्मीदों के टूटने का होता है।
इसलिए उसने तय कर लिया था कि अब किसी को अपनी ज़िंदगी में इतनी जगह नहीं देगी कि उसके जाने या बदल जाने से उसकी दुनिया बिखर जाए।
लेकिन ज़िंदगी कब किसी के फ़ैसलों की परवाह करती है…
एक दिन उसकी ज़िंदगी में विहान आया।
विहान ने उसकी ख़ामोशी में दिलचस्पी दिखाई। उसने सान्वी के मन की गाँठों को खोलने की कोशिश की। वह बार-बार उसे समझाता कि हर इंसान एक जैसा नहीं होता।
जब सान्वी ने कहा था—
“मुझे किसी की आदत नहीं बनानी… क्योंकि आदतें जब छूटती हैं, तब इंसान जीते-जी टूट जाता है।”
तब विहान ने उसका हाथ थामकर कहा था—
“मैं तुम्हारी ज़िंदगी में दर्द बढ़ाने नहीं, उसे कम करने आया हूँ।”
सान्वी ने बहुत मना किया था।
उसने बार-बार कहा था कि वह रिश्तों से डरती है। लोगों से नहीं, लेकिन उनके बदल जाने से डरती है।
मगर विहान हार मानने वालों में से नहीं था।
उसने भरोसा दिया।
अपनापन दिया।
समय दिया।
और धीरे-धीरे सान्वी ने अपने दिल का वह दरवाज़ा खोल दिया, जिसे उसने वर्षों से बंद कर रखा था।
फिर वही हुआ, जो अक्सर होता है…
दिन की शुरुआत एक-दूसरे की आवाज़ से होने लगी।
हर छोटी-बड़ी बात साझा होने लगी।
दूरी में भी नज़दीकियाँ महसूस होने लगीं।
सान्वी को लगने लगा कि शायद इस बार उसकी सोच गलत साबित हो जाएगी।
शायद सचमुच हर कहानी का अंत एक जैसा नहीं होता।
शायद इस बार कोई रहेगा।
शायद इस बार उसे छोड़कर जाने वाला कोई नहीं होगा।
लेकिन समय के साथ सब बदलने लगा।
बहुत धीरे-धीरे…
इतना धीरे कि शुरुआत में सान्वी खुद भी समझ नहीं पाई।
जो संदेश पहले कुछ सेकंड में आ जाते थे, अब घंटों बाद आने लगे।
जो व्यक्ति उसके बिना एक दिन नहीं रह पाता था, अब कई-कई दिनों तक व्यस्त रहने लगा।
जो उसकी ख़ामोशी पूछ लेता था, अब उसकी बातों में भी छिपी उदासी समझने की फ़ुर्सत नहीं रखता था।
और सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की थी कि विहान को शायद अपने बदलने का एहसास भी नहीं था।
वह आज भी कहता था कि वह सान्वी से प्यार करता है।
लेकिन उसके व्यवहार और शब्दों के बीच का फ़ासला सान्वी को परेशान करने लगा था।
वह सोचती थी—
“क्या मैं वही लड़की नहीं हूँ, जिससे कभी घंटों बातें की जाती थीं?”
“क्या मेरी बातें अब इतनी महत्वपूर्ण नहीं रहीं?”
“क्या मैं सिर्फ़ एक आदत थी, जो अब पुरानी हो गई?”
उसके मन में हज़ारों सवाल थे।
मगर जवाब एक भी नहीं।
वह शिकायत करना चाहती थी, लेकिन डरती थी।
कहीं उसे ज़रूरतमंद न समझ लिया जाए।
कहीं ऐसा न लगे कि वह प्यार माँग रही है।
इसलिए वह चुप रही।
रात को वह अक्सर फ़ोन की स्क्रीन देखती रहती।
ऑनलाइन आते-जाते नाम को देखती और किसी संदेश की प्रतीक्षा में जागती रहती।
फिर खुद पर ही मुस्कुरा देती।
उसे याद आता कि कभी उसने खुद से वादा किया था कि वह किसी को अपनी आदत नहीं बनने देगी।
लेकिन अब वही आदत उसकी सबसे बड़ी कमज़ोरी बन चुकी थी।
सबसे ज़्यादा दर्द उसे इस बात का नहीं था कि विहान बदल गया था।
दर्द इस बात का था कि उसने विहान पर भरोसा कर लिया था।
उसने उन वादों पर विश्वास कर लिया था, जिन्हें सुनकर उसने अपने डर छोड़ दिए थे।
उसने अपने बंद दरवाज़े खोल दिए थे।
और अब उसे ऐसा लगता था, जैसे कोई उन खुले दरवाज़ों से उसकी उम्मीदें चुराकर ले गया हो।
दिल का दर्द शायद आँसुओं से निकल जाता है।
लेकिन उम्मीदों का दर्द…
वह आँखों से नहीं, आत्मा से बहता है।
कई बार सान्वी भीड़ में बैठी होती और अचानक उसकी आँखें भर आतीं।
लोग समझते, शायद वह थकी हुई है।
लेकिन कोई नहीं जानता था कि वह थकी नहीं थी…
वह अपने भीतर चल रहे सवालों से जूझ रही थी।
क्योंकि जब दिल टूटता है, तब इंसान किसी और को दोष दे सकता है।
लेकिन जब उम्मीद टूटती है, तब इंसान खुद से सवाल करने लगता है
“क्या गलती मेरी थी?”
“क्या मुझे भरोसा नहीं करना चाहिए था?”
“क्या मुझे फिर से किसी को अपनी दुनिया में आने ही नहीं देना चाहिए था?”
इन सवालों के जवाब शायद किसी के पास नहीं थे।
बस एक खालीपन रह गया था, जिसे शब्दों में बाँटना आसान नहीं था।
और एक ऐसी सीख, जिसे सान्वी अपने भीतर दर्ज कर चुकी थी—
दिल टूटने का दर्द कुछ समय बाद कम हो जाता है, लेकिन उम्मीदों के टूटने की आवाज़ इंसान बहुत लंबे समय तक अपने भीतर सुनता रहता है।

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