रात को जलाने आई हूँ
चुभती ख़ामोशी, डराता सन्नाटा और रात की बेचैन शांति—‘रात को जलाने आई हूँ’ इन्हीं भावों के बीच अंतर्मन की आवाज़ और विद्रोह को शब्द देती है।

चुभती ख़ामोशी, डराता सन्नाटा और रात की बेचैन शांति—‘रात को जलाने आई हूँ’ इन्हीं भावों के बीच अंतर्मन की आवाज़ और विद्रोह को शब्द देती है।