ख़ामोश घर की दीवारें फुसफुसाती हैं
बरसों से सूना पड़ा पुश्तैनी घर आज भी अपने लोगों की आहट का इंतज़ार कर रहा है। रवि जब लौटता है, तो दीवारें, चूल्हा, गुलमोहर और आँगन की तुलसी उसे बीते रिश्तों और यादों की कहानी सुनाते हैं।

बरसों से सूना पड़ा पुश्तैनी घर आज भी अपने लोगों की आहट का इंतज़ार कर रहा है। रवि जब लौटता है, तो दीवारें, चूल्हा, गुलमोहर और आँगन की तुलसी उसे बीते रिश्तों और यादों की कहानी सुनाते हैं।
पुश्तैनी घर ईंट-पत्थर नहीं होते, वे पीढ़ियों की साँसें सँजोए रहते हैं। उनकी दीवारों में हँसी की गूँज, डाँट की तपिश और रिश्तों की गर्माहट कैद रहती है। जब हम उन्हें छोड़ देते हैं, वे धीरे-धीरे खंडहर नहीं, मौन पीड़ा में बदलते हैं जीते-जी मरते हुए।