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पुश्तैनी घर

सुधा शर्मा, प्रसिद्ध लेखिका, कानपुर

हुआ करते थे कभी।
चला करते थे, पीढ़ी दर पीढ़ी।
बरसों बरस….।
सहेजे पूर्वजों का अनुभव।
ज्ञान, अभिमान।
रिश्तों की गर्माहट,
खिलखिलाहट।

अपनो के घर के भीतर।
आने और जाने की आहट।
सांझे त्योहार, ढेर सारे उत्सव।
डांट, झिड़क व प्यार।
छोटों का रुठना।
बड़ों की मनुहार।

सारे खट्टे, मीठे अहसास।
जीवित ही दफ्न रहते हैं।
उसके शनैः शनैः।
खण्डर होते हुए।
अस्तित्व में..।

कभी तो जाओ।
समझो उसका दर्द।
उसकी मौन व्यथा।
मौन को चाहिए स्वर।
आखिर….. वह रहा है मर।
हमारा पुश्तैनी घर।

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