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पेटीएम है…

सब्जी के ठेले पर खरीदारी करती अंजलि और बुजुर्ग सब्जी विक्रेता एक साधारण मुलाकात में छिपी मानवीय संवेदना की कहानी.
nirja krishna writer

नीरजा कृष्णा

आज दस दिनों के बाद अंजलि दिल्ली लौटी है। एयरपोर्ट से निकलते ही उसे याद आया… अरे, राघव भी तो टूर पर हैं और मम्मी जी अपने भतीजे के यहाँ चली गई हैं। घर पर फ्रिज़ में भी शायद कुछ भी न हो।

“अरे दिलीप, दो पैकेट दूध ले लो…”

तभी सामने ठेले पर रंग-बिरंगी सब्ज़ियाँ बेचती उस अधेड़ महिला पर उसकी नज़र पड़ी और वह चहकते हुए बोली,

“दिलीप, उस ठेले वाली के सामने गाड़ी रोको। कितनी ताज़ी और बढ़िया सब्ज़ियाँ हैं। आज मैं स्वयं देख-सुनकर ढेर सारी सब्ज़ियाँ खरीदूँगी।”

और वह कार से उतरकर सब्ज़ियाँ तुलवाने लगी और सबका पेमेंट भी कर दिया। वह गाड़ी में बैठने के लिए मुड़ी ही थी, तभी वह सब्ज़ी वाली पुकार बैठी,

“बेटी, तुमने नींबू, अदरक और धनिया-मिर्च तो लिया ही नहीं। देखो, यह हरा धनिया तो मेरी बगिया का एकदम गार्डन फ्रेश है।”

अंजलि के थके चेहरे पर भी उसकी बात पर मुस्कान छा गई।

“ठीक कह रही हो अम्मा! अभी मेरी मम्मी जी भी घर पहुँचती होंगी। उनकी थाली में नमक और हरी मिर्च तो अवश्य ही रखा जाता है। और ताज़े धनिए की चटनी की तो बात ही निराली है…”

कहते हुए उसने धनिया, हरी मिर्च और चार नींबू भी ले लिए। पेमेंट के लिए पर्स खोलते ही चौंकी,

“हाय अम्मा, छुट्टा तो अब है ही नहीं। एक पाँच सौ का नोट बचा है।”

निराश होकर वह सामान की थैली लौटाने लगी, पर वह सब्ज़ी वाली अम्मा बोल पड़ी,

“पेटीएम है।”

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