मौसमी चंद्रा की पुस्तक इश्क है कि जादू-टोना से

मौसमी चंद्रा, पटना
तेरे नाम की मिट्टी में
मैं हर दिन बो देती हूँ
अपने सपनों के बीज!
धूप आती है,
तेरे कहे शब्दों जैसी गर्माहट लेकर,
और वे बीज चुपचाप
तेरी ओर बढ़ने लगते हैं!
मेरे भीतर का हर सन्नाटा
तेरी हँसी सुनकर
धीरे-धीरे पिघल जाता है…
मैं कुछ नहीं माँगती,
न वक़्त का कोई वादा,
न भविष्य की कोई मुहर!
बस इतना भर
कि जब भी मैं आँखें मूँद लूँ,
तेरी मौजूदगी
मेरी साँसों में उतर आए…!
इन रचनाओं को भी पढ़ें-
“मन अमराई महकी रे”
बोगनवेलिया
यादों की गलियों में लौट चलें
ऑर्गेनिक कहानी
सुकून
काश तुम मेरी खामोशी पढ़ पाते…
खुद से मिलने की तमन्ना
