
रीता मिश्रा तिवारी, भागलपुर
घटाटोप सावन की बारिश में,
तुम्हारी यादों में भीगी मिलूँगी मैं
उसी लाल बोगनवेलिया के नीचे..!
वही बोगनवेलिया, जो
बादलों को देख मुस्कुराकर कहता है
इश्क़ में दूरियाँ चाहे जितनी हों,
वफ़ा की महक कभी कम नहीं होती..!
घनघोर झमाझम बारिश में,
काँटों के बीच भीगी लाल पंखुड़ियों को
चूमकर गिरती हैं बूँदें, जैसे
तुम्हारा ख़याल रूह को छू जाता है..!
आसमान से बरसती बूँदें और
शाखों पर भीगता बोगनवेलिया,
मानो कायनात ने आज हमारी
अधूरी दास्तान लिख दी हो..!
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