चोर को पकड़ने के बाद भी भूख के डर से जूझता एक गरीब मजदूर शंभू

डर

चोर को पकड़ने वाला साहसी शंभू किसी इंसान से नहीं डरता, लेकिन जब पत्नी उससे उसके सबसे बड़े डर के बारे में पूछती है, तो उसका उत्तर समाज की सबसे कड़वी सच्चाई उजागर कर देता है—भूख।

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शहर में अपने लापता बेटे की तलाश करती बिहार की एक संघर्षशील माँ

तलाश

बिहार के एक छोटे से गाँव की सावित्री अपने लापता बेटे की तलाश में शहर पहुँच जाती है। अनेक कठिनाइयों और संघर्षों के बावजूद वह हार नहीं मानती और अपनी ममता की ताकत से अपने बेटे को ढूँढ़ निकालती है। यह कहानी माँ के अटूट प्रेम और साहस का अद्भुत उदाहरण है।

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सांवला रंग

“सांवला रंग” एक प्रेरक लघुकथा है जो समाज में व्याप्त रंगभेद की मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है। कहानी में एक माँ अपने जीवन में झेले गए तिरस्कार को याद करते हुए संकल्प लेती है कि उसकी बेटी की पहचान उसके रंग से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों से होगी। वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम तब सामने आता है जब उसकी बेटी आई.पी.एस. अधिकारी बनकर पूरे शहर का गौरव बन जाती है।

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A poor woman in a faded saree stands near a luxurious modern apartment building

दीवार के उस पार..

एक मासूम बच्चा सिर्फ एक सुंदर बिल्डिंग को छूना चाहता था, लेकिन समाज ने उसे “चोर” कहकर थप्पड़ दे दिया। यह कहानी गरीबी, स्वाभिमान और सपनों के बीच खड़ी अदृश्य दीवारों की मार्मिक सच्चाई को उजागर करती है।

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भीड़भरी भारतीय सिटी बस में एक कॉलेज लड़की गर्भवती मजदूर महिला को सीट पर बैठा रही है, जबकि अन्य यात्री शर्मिंदा नजर आ रहे हैं।

शर्मिंदा

“शर्मिंदा” एक मार्मिक हिंदी लघुकथा है, जो समाज की संवेदनहीनता और दिखावटी व्यवहार पर गहरा प्रहार करती है। बस में खड़ी एक गर्भवती मजदूर महिला को कोई सीट नहीं देता, लेकिन कुछ युवाओं का व्यवहार कॉलेज लड़कियों के आते ही बदल जाता है। तभी एक समझदार लड़की इंसानियत की मिसाल पेश करते हुए महिला को सीट पर बैठा देती है। यह छोटी-सी घटना बड़े सामाजिक संदेश के साथ सामने आती है। कहानी बताती है कि सम्मान रूप देखकर नहीं, जरूरत देखकर देना चाहिए। यह लघुकथा पाठकों को आत्ममंथन के लिए मजबूर करती है।

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फोन पर माता-पिता से तलाक पर बहस करती महिला, भावनात्मक पारिवारिक संघर्ष का दृश्य।

बसा बसाया घर

‘बसा-बसाया घर’ एक ऐसी मार्मिक लघुकथा है, जिसमें बेटी अपने तलाक के फैसले पर अडिग रहती है। माता-पिता उसे समझाने की कोशिश करते हैं, लेकिन बातचीत के दौरान वह उनके अतीत का ऐसा सच सामने रख देती है, जिससे दोनों निरुत्तर हो जाते हैं। कहानी रिश्तों में विश्वास, दोहरे मापदंड और आत्मसम्मान जैसे गंभीर विषयों को उजागर करती है। यह कथा बताती है कि दूसरों को सलाह देना आसान है, लेकिन जब सच सामने आता है तो अपने ही बनाए मूल्य टूट जाते हैं।

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बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार

काली राख की बस्ती

यह मार्मिक कथा बठिंडा की काली राख से ढकी बस्ती में रहने वाले एक गरीब परिवार की है, जिसकी जिंदगी एक दर्दनाक घटना के बाद हमेशा के लिए बदल गई। गरीबी, मजबूरी और समाज की कठोर सच्चाइयों को उजागर करती यह कहानी दिल को झकझोर देती है।

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हथकड़ी पहनी एक बुजुर्ग महिला पुलिस के साथ भीड़ के बीच खड़ी है, चेहरे पर कठोर भाव और पीछे पुरानी गली में जुटे लोग, जो एक दर्दनाक अतीत और प्रतिशोध की कहानी को दर्शाता है।

थरथराता सच

रश्मि लहर, लखनऊ सोना धूप में बैठकर अपने लंबे बालों को सुखा रही थी। उसके बाल उसके व्यक्तित्व का प्रभावशाली हिस्सा थे। वह अपनी बड़ी-बड़ी तथा मासूमियत से भरी ऑंखों को बंद करके धूप का आनंद ले रही थी। जाड़ों में पुराने लखनऊ की छतों पर अलग ही रौनक होती है। सोना को यह सोचकर…

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अधूरी रजाइयाँ

बारह साल की शादी के बाद भी घर में बच्चे की किलकारी नहीं गूँजी थी. हरमन और परमिंदर के बीच रिश्ते की खामोशी धीरे-धीरे आदत बन चुकी थी. बेरोज़गारी, बेबसी और अधूरेपन के बीच हरमन की माँ अपनी सुई से रजाइयाँ सीती रही—हर टाँके में एक टूटी हुई उम्मीद पिरोती हुई.
परमिंदर ने हालात से लड़ने की कोशिश की, मगर समाज की नजरें और रिश्तों की उलझनें उसे उस मोड़ पर ले आईं, जहाँ सही और गलत के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है. जब एक बच्ची जन्मी, तो सच सब जानते थे, पर खामोशी ने ही इज़्ज़त का कंबल ओढ़ लिया.

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