सामाजिक कहानी
आश्वासन
‘आश्वासन’ एक ऐसी मार्मिक हिंदी कहानी है, जिसमें एक माँ अदालत के सामने अपनी अजन्मी बेटी की सुरक्षा को लेकर सवाल उठाती है। यह कहानी केवल कन्या भ्रूण-हत्या पर नहीं, बल्कि समाज, कानून और महिला सुरक्षा की वास्तविक स्थिति पर गहरा चिंतन प्रस्तुत करती है। अंत का प्रश्न पाठक के मन में लंबे समय तक गूंजता रहता है।
आख़िरी रात
ज़ीनत की ज़िंदगी बागबानी, परिवार और अपने छात्रों के बीच खुशी से बीत रही थी। शादी की सालगिरह मनाने के लिए वह अपने पति फ़रीद और बेटे के साथ मुंबई के ताज होटल पहुँचती है। लेकिन 26 नवंबर 2008 की वह रात उनकी ज़िंदगी की सबसे भयावह रात बन जाती है। गोलियों, धमाकों और दहशत के बीच यह कहानी सिर्फ़ एक परिवार की त्रासदी नहीं, बल्कि इंसानियत, प्रेम और आतंकवाद के खिलाफ़ खड़े होने वाले साहस की भी मार्मिक दास्तान है।
‘सबक’
‘सबक’ एक मार्मिक हिंदी लघुकथा है, जो यह बताती है कि संवेदना और कृतज्ञता केवल इंसानों की नहीं, पशुओं की भी पहचान होती है। गंगू चाची के स्नेह और सम्मान का ऋण चुकाने के लिए शेरू अन्याय का डटकर सामना करता है। यह कहानी केवल एक कुत्ते की वफ़ादारी नहीं, बल्कि महिला सम्मान, मानवीय संवेदनाओं और गलत के खिलाफ खड़े होने का सशक्त संदेश भी देती है। अंत में पाठक के मन में यही प्रश्न रह जाता है कि असली इंसानियत किसमें है इंसान में या उस बेजुबान में?
हर्ष के अंकुर
‘फिर हर्ष के अंकुर फूटने लगे’ एक मार्मिक सामाजिक कहानी है, जो बताती है कि माता-पिता का सम्मान केवल नैतिक कर्तव्य नहीं, बल्कि परिवार की सबसे बड़ी पूँजी है। उपेक्षा, अकेलेपन और पीड़ा से जूझ रहे एक बुजुर्ग दम्पति की कहानी तब नया मोड़ लेती है, जब समाज, प्रशासन और परिवार मिलकर रिश्तों को टूटने से बचाने का प्रयास करते हैं। पश्चाताप, क्षमा और सेवा के भाव से यह कहानी मानवीय संवेदनाओं को गहराई से स्पर्श करती है।
सुनहरी ज़ंजीरें
मुंबई के पॉश इलाके में समुद्र के किनारे बना “रत्नालय” दूर से किसी महल जैसा दिखाई देता था। ऊँची दीवारें, चमचमाती काँच की खिड़कियाँ, विदेशी गाड़ियाँ और हर समय आने-जाने वाले लोगों की भीड़—ये सब कुछ उस आलीशान घर की हैसियत बयान करती थीं।
सांवला रंग
“सांवला रंग” एक प्रेरक लघुकथा है जो समाज में व्याप्त रंगभेद की मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है। कहानी में एक माँ अपने जीवन में झेले गए तिरस्कार को याद करते हुए संकल्प लेती है कि उसकी बेटी की पहचान उसके रंग से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों से होगी। वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम तब सामने आता है जब उसकी बेटी आई.पी.एस. अधिकारी बनकर पूरे शहर का गौरव बन जाती है।
दीवार के उस पार..
एक मासूम बच्चा सिर्फ एक सुंदर बिल्डिंग को छूना चाहता था, लेकिन समाज ने उसे “चोर” कहकर थप्पड़ दे दिया। यह कहानी गरीबी, स्वाभिमान और सपनों के बीच खड़ी अदृश्य दीवारों की मार्मिक सच्चाई को उजागर करती है।
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