उलझन

चुप्पी, अविश्वास और यौन उत्पीड़न पर आधारित मार्मिक हिंदी कहानी 'उलझन'

मधु मिश्रा

सुबह जैसे ही मम्मी उठीं, दरवाज़े की आहट और आँगन से आती सर्द हवाओं की सरसराहट से डॉली की नींद खुल गई। लेकिन वह फिर से रज़ाई में दुबककर सो गई।

उसे दोबारा सोते देखकर मम्मी ने प्यार से कहा,
“उठ जा बेटा, पढ़ना नहीं है क्या?”

डॉली ने उनींदी आवाज़ में कहा,
“नहीं मम्मी… रात को दो बजे तक पढ़ाई की है। और ठंड में सुबह-सुबह की नींद का तो अपना ही मज़ा है… वाह!”

यह कहते हुए वह फिर से लड्डू की तरह गोल-मोल होकर रज़ाई में सिमट गई।

थोड़ी देर बाद जब डॉली उठी, तो मम्मी ने कहा,

“बेटा, तेरी दीदी का फ़ोन आया था। उसकी डिलीवरी का समय हो गया है। तुझे उसके पास जाना पड़ेगा।”

यह सुनते ही डॉली जैसे चौंक गई। उसने तुरंत कहा,

“नहीं मम्मी, मैं नहीं जाऊँगी। आप चली जाइए। मैं यहाँ घर भी संभाल लूँगी और पापा का भी पूरा ध्यान रखूँगी।”

उसकी आवाज़ में दृढ़ता साफ़ झलक रही थी।

मम्मी ने उसे समझाते हुए कहा,

“अरे बेटा, ऐसा मत कर। तेरी दीदी का वहाँ कोई नहीं है। हमें ही उसका सहारा बनना होगा।”

लेकिन डॉली ने फिर साफ़ इंकार कर दिया।

“नहीं मम्मी। मेरे प्रैक्टिकल की तैयारी चल रही है। परीक्षा भी सिर पर है। मैं नहीं जा सकती।”

दीदी का नाम सुनते ही उसके मन में जीजाजी से जुड़ी वे कड़वी यादें फिर से ताज़ा हो गईं।

पिछली छुट्टियों में जब वह दीदी के घर गई थी, तब जीजाजी ने उसके साथ ऐसी हरकतें की थीं, जिन्हें याद करके आज भी उसकी रूह काँप जाती थी। उसने वह बात आज तक किसी से नहीं कही थी। उसी दिन उसने मन-ही-मन कसम खा ली थी कि वह दोबारा कभी उस घर में कदम नहीं रखेगी।

तभी मम्मी ने उसे हल्के से झकझोरते हुए पूछा,

“क्या हुआ बेटा? कहाँ खो गई?”

फिर वे समझाने लगीं,

“देख, अगर यहाँ अच्छे अस्पताल की सुविधा होती, तो मैं पूजा को यहीं बुला लेती। लेकिन वहाँ मुझे अकेले सब संभालना मुश्किल होगा। तू साथ रहेगी तो मेरा भी सहारा रहेगा। पढ़ाई की चिंता मत कर। अपनी किताबें साथ ले जाना। समय मिलेगा तो पढ़ लेना। तेरी दीदी भी कह रही थी कि डॉली की परीक्षा है, इसलिए उसे ज़्यादा दिन नहीं रोकूँगी। यहाँ से पापा तुझे ट्रेन में बैठा देंगे और नासिक स्टेशन पर अजय तुझे लेने आ जाएगा।”

मम्मी की बात सुनकर भी डॉली का मन नहीं माना।

पूरा दिन इसी बात पर हाँ-ना चलती रही। आखिरकार मम्मी के बार-बार समझाने और आग्रह करने पर डॉली तैयार हो गई।

अगली सुबह पापा उसे ट्रेन में बैठाकर लौट आए।

ट्रेन चलने लगी तो डॉली ने आँखें बंद कर भगवान से प्रार्थना की—

“हे भगवान… इस बार सब कुछ ठीक रखना। मेरे साथ कुछ भी गलत न होने देना।”

कुछ ही घंटों बाद ट्रेन नासिक पहुँच गई।

स्टेशन पर जीजाजी उसे लेने आए हुए थे। पूरे रास्ते डॉली ने उनसे कोई बात नहीं की।

घर पहुँचते ही पूजा ने उसे गले से लगा लिया और मुस्कराकर बोली,

“अब मैं बिल्कुल निश्चिंत हो गई हूँ। मेरी डॉली आ गई है, अब सब कुछ संभाल लेगी।”

संयोग से दो ही दिन बाद पूजा को प्रसव पीड़ा शुरू हो गई।

अस्पताल पहुँचने के कुछ ही समय बाद एक प्यारी-सी बच्ची ने जन्म लिया।

डिलीवरी सामान्य होने के कारण तीसरे ही दिन पूजा को अस्पताल से छुट्टी मिल गई।

घर लौटने के बाद डॉली ने पूरे मन से उसकी देखभाल शुरू कर दी। उसने दीदी को दूध और नाश्ता दिया। फिर नहाकर रसोई में खाना बनाने लगी।

उसी समय जीजाजी रसोई में आ गए।

उन्होंने मुस्कराते हुए कहा,

“अरे साली जी… नाराज़ हो क्या? इस बार तो ठीक से बात भी नहीं कर रही हो।”

डॉली चुप रही।

उन्होंने फिर हँसते हुए कहा,

“अरे… साली तो आधी घरवाली होती है, मेरी जान…”

इतना कहते हुए उनका हाथ धीरे-धीरे डॉली की पीठ पर सरकने लगा।

डॉली बिजली की तरह पलटी।

उसकी आँखों में गुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था।

वह कड़ी आवाज़ में बोली,

“प्लीज़… जीजाजी! इस बार मैं कुछ भी बर्दाश्त नहीं करूँगी। बेहतर होगा कि आप मुझसे दूर ही रहें।”

अजय हल्का-सा हँसकर बोला,

“अच्छा बाबा… जैसा तुम कहो।”

और वह रसोई से बाहर निकल गया।
थोड़ी देर बाद डॉली खाना लेकर दीदी के कमरे में पहुँची। उसने देखा, जीजाजी नन्ही बच्ची के बालों को सहलाते हुए पूजा से कह रहे थे,

“थैंक यू, पूजा… इतना प्यारा-सा उपहार देने के लिए।”

डॉली के कमरे में प्रवेश करते ही उनकी नज़र उस पर पड़ी। अगले ही पल वे कुटिल मुस्कान के साथ डॉली की ओर देखने लगे और दिखावे के लिए पूजा का हाथ सहलाने लगे।

डॉली ने तुरंत अपनी नज़रें फेर लीं।

उसी क्षण उसे मम्मी की बातें याद आने लगीं। वे अक्सर कहा करती थीं—

“पूजा और अजय की जोड़ी कितनी अच्छी लगती है। हमारा दामाद जितना देखने में सुंदर है, उतना ही समझदार भी है। वह तो हमारे बेटे की तरह हमारा ध्यान रखता है।”

मगर आज डॉली के मन में एक ही सवाल उठ रहा था—

“क्या सचमुच इंसान की सूरत और सीरत में इतना बड़ा अंतर हो सकता है?”

वह इन्हीं विचारों में खोई थी कि पूजा ने उसकी तंद्रा भंग कर दी।

“अरे डॉली… क्या सोच रही है?”

डॉली चौंक गई।

“कुछ नहीं दीदी…”

उसने मुस्कराने का असफल प्रयास करते हुए उनके हाथ में खाने की प्लेट थमा दी।

फिर संयत स्वर में जीजाजी से बोली,

“खाना मैंने टेबल पर लगा दिया है। आप खा लीजिए… मैं बाद में खा लूँगी।”

इतना कहकर वह वापस दीदी के पास आकर बैठ गई।

उस घटना के बाद चार-पाँच दिन तक सब कुछ सामान्य रहा।

डॉली ने भी राहत की साँस ली कि शायद जीजाजी अपनी हरकतों से बाज आ गए हैं।

लेकिन उसकी यह राहत अधिक दिन टिक न सकी।

एक दिन दोपहर का समय था।

पूजा खाना खाकर बच्ची के साथ सो रही थी। घर में सन्नाटा पसरा था।

डॉली बरामदे में बैठकर अपनी परीक्षा की तैयारी कर रही थी।

उसे बिल्कुल भी आभास नहीं हुआ कि पीछे से दबे पाँव कोई उसकी ओर बढ़ रहा है।

अचानक किसी ने पीछे से उसके दोनों कंधों को पकड़ लिया।

डॉली बुरी तरह चौंक गई।

उसने पलटकर देखा

सामने जीजाजी खड़े थे।

वह मुस्कराते हुए बोले,

“इतना गुस्सा क्यों होती हो… मेरी जान?”

इस बार डॉली का धैर्य टूट चुका था।

वह झटके से पलटी और पूरी ताकत से उनका हाथ मरोड़ते हुए बोली,

“अपना हाथ संभालकर रखिए। आप मेरी चुप्पी का लगातार फायदा उठाते जा रहे हैं। लेकिन अब बहुत हो चुका। आज मैं दीदी को सब कुछ बता दूँगी।”

उसकी आवाज़ गुस्से से काँप रही थी।

उसी क्षण कमरे का दरवाज़ा खुला।

पूजा सामने खड़ी थी।

उसे देखते ही डॉली ने तुरंत जीजाजी का हाथ छोड़ दिया।

लेकिन जो दृश्य पूजा ने देखा था, उसने उसे पूरी तरह भ्रमित कर दिया।

उसका चेहरा क्रोध से लाल हो उठा।

वह तेज़ आवाज़ में चिल्लाई—

“ये क्या चल रहा है यहाँ, डॉली? मैंने तुझे अपना घर संभालने के लिए बुलाया था या मेरा घर उजाड़ने के लिए? क्या मैं मर गई हूँ?”

डॉली हड़बड़ा गई।

वह तुरंत पूजा के पास पहुँची और उसका हाथ पकड़ते हुए बोली—

“दीदी… आप गलत समझ रही हैं। पहले मेरी बात तो सुन लीजिए।”

लेकिन पूजा ने झटके से अपना हाथ छुड़ा लिया।

उसकी साँसें तेज़ चल रही थीं।

आँखों में आक्रोश साफ़ दिखाई दे रहा था।

उधर अजय सिर झुकाए बिल्कुल शांत खड़े थे, मानो उन्हें कुछ पता ही न हो।

उनके चेहरे पर ऐसी मासूमियत थी कि पहली नज़र में कोई भी उन्हें निर्दोष मान ले।

डॉली समझ गई कि वे जानबूझकर सारी गलती उसी के सिर मढ़ देना चाहते हैं।

उसने एक बार फिर हिम्मत जुटाई।

“दीदी… मेरी बात सुनिए। सच्चाई वैसी नहीं है जैसी आप समझ रही हैं।”

लेकिन पूजा अब कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी।

वह गुस्से में बोली—

“क्या सुनूँ मैं? अब देखने और समझने के लिए कुछ बचा ही कहाँ है! तेरे जीजाजी तुझे अपनी छोटी बहन की तरह मानते हैं, तेरा इतना ख्याल रखते हैं… और तूने उसी भरोसे का ये बदला दिया? मुझे तो कभी सपने में भी नहीं लगा था कि तू इतनी गिर सकती है।”

डॉली की आँखों से आँसू बहने लगे।

वह बार-बार विनती करती रही—

“दीदी… प्लीज़, मेरा विश्वास कीजिए। कभी-कभी आँखों से देखा हुआ भी सच नहीं होता। बस एक बार… मेरी पूरी बात सुन लीजिए।”

लेकिन पूजा का क्रोध उसके विश्वास पर भारी पड़ चुका था।

उसने डॉली की एक भी बात सुनने से इंकार कर दिया।
पूजा का क्रोध अब चरम पर था। उसने डॉली की ओर कठोर निगाहों से देखा और लगभग अंतिम निर्णय सुनाने वाले स्वर में बोली—

“डॉली, अपना सामान समेटो और अभी इसी वक्त मेरे घर से निकल जाओ। मैं तुम्हें अब एक मिनट भी यहाँ बर्दाश्त नहीं कर सकती। ट्रेन का समय हुआ है या नहीं, मुझे इससे कोई मतलब नहीं। बस, तुम अभी के अभी यहाँ से चली जाओ।”

पूजा के इस कठोर और निर्णयात्मक फैसले के आगे अब कुछ भी शेष नहीं बचा था।

डॉली स्तब्ध खड़ी रह गई।

जिस बहन के लिए वह अपनी पढ़ाई छोड़कर यहाँ आई थी, वही बहन आज उसकी एक बात सुनने को तैयार नहीं थी।

उसने एक बार फिर पूजा की ओर उम्मीद भरी निगाहों से देखा, लेकिन वहाँ उसे केवल अविश्वास और क्रोध दिखाई दिया।

धीरे-धीरे वह अपने कमरे में गई और अपना सामान समेटने लगी।

कपड़े बैग में रखते हुए उसके मन में अनगिनत विचार उमड़ने लगे।

“जब मेरी अपनी बहन ही मेरी बात सुनने को तैयार नहीं है, तो मैं किसके पास जाऊँ? किससे न्याय की उम्मीद करूँ?”

उसकी आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे।

उसे लग रहा था मानो उसकी चुप्पी ही उसके खिलाफ सबसे बड़ा सबूत बन गई हो।

वह बुदबुदाई—

“गलती तो मेरी ही थी… जो मैंने जीजाजी का सच छिपाया। उस दिन अगर मैं सब कुछ बता देती, तो शायद आज मुझे यह दिन नहीं देखना पड़ता।”

उसने गहरी साँस ली।

“उन्होंने अपना गुनाह छिपाने के लिए मेरे चरित्र पर ही सवाल खड़े कर दिए… और मैं कुछ भी साबित नहीं कर पा रही हूँ। आखिर मैं कैसे साबित करूँ कि दोषी मैं नहीं, वे हैं?”

उसका गला भर आया।

उसे महसूस हो रहा था कि उसकी साँसें जैसे उसके ही भीतर कहीं अटक गई हैं।

कुछ ही देर में उसने अपना बैग उठाया और भारी कदमों से दरवाजे की ओर बढ़ी।

घर से बाहर निकलते समय उसने एक बार फिर मुड़कर पूजा की ओर देखा।

शायद उसे उम्मीद थी कि आखिरी क्षण में दीदी उसे रोक लेंगी… उसकी बात सुन लेंगी… या कम-से-कम उसकी आँखों में छिपे दर्द को पढ़ लेंगी।

लेकिन पूजा अब भी दूसरी ओर मुँह किए खड़ी थी।

डॉली की आँखों में एक अंतिम उम्मीद थी, जो अगले ही पल टूट गई।

उसकी नज़र फिर उस नन्ही बच्ची पर पड़ी, जो बेखबर होकर पालने में सो रही थी।

डॉली कुछ क्षण उसे देखती रही।

फिर उसके मन में एक टीस उठी।

वह मन-ही-मन बोली—

“दीदी… अब तुम्हारी भी एक बेटी है। भगवान करे उसे कभी मेरी जैसी परिस्थिति का सामना न करना पड़े। उसे कभी ऐसी उलझन में न जीना पड़े, जहाँ सच बोलने का साहस भी अपराध बन जाए और चुप रहना भी।”

उसकी आँखों से आँसुओं की एक और धारा बह निकली।

अब वहाँ रुकने का कोई अर्थ नहीं था।

उसने अपने आँसू पोंछे, बैग का पट्टा संभाला और भारी मन से स्टेशन की ओर चल पड़ी।

सड़क पर लोगों की भीड़ थी, आवाजाही थी, जीवन अपनी रफ्तार से चल रहा था, लेकिन डॉली के भीतर सब कुछ जैसे ठहर गया था।

उसके मन में केवल एक प्रश्न बार-बार उठ रहा था—

“क्या कभी ऐसा दिन आएगा, जब मेरा सच सामने आएगा? क्या दीदी कभी समझ पाएँगी कि दोषी मैं नहीं थी?”

इन सवालों का उसके पास कोई उत्तर नहीं था।

वह बस आगे बढ़ती रही…

अपने आँसुओं, अपने दर्द और अपनी अनकही सच्चाई के साथ।

शायद कुछ उलझनें समय सुलझा देता है…

और शायद कुछ उलझनें जीवन भर मन के किसी कोने में चुपचाप गाँठ बनकर रह जाती हैं।

3 thoughts on “उलझन

  1. सुरेश जी मेरी रचना आपने प्रकाशित की आपको आत्मिक आभार 🙏💐

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