भीड़ में वह अनचाहा स्पर्श
भीड़ में हर स्पर्श आकस्मिक नहीं होता. जानिए कब अनचाहा शारीरिक संपर्क बदसलूकी का संकेत हो सकता है और ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए क्या व्यावहारिक कदम उठाएं.

भीड़ में हर स्पर्श आकस्मिक नहीं होता. जानिए कब अनचाहा शारीरिक संपर्क बदसलूकी का संकेत हो सकता है और ऐसी स्थिति में अपनी सुरक्षा के लिए क्या व्यावहारिक कदम उठाएं.
यह कविता एक स्त्री के उस अनुभव को गद्यात्मक रूप में सामने रखती है, जहां शारीरिक छेड़छाड़ के बिना भी उसकी गरिमा पर हमला किया जाता है. यह रचना बताती है कि किसी की घूरती, गंदी नजरें भी हिंसा का ही रूप होती हैं, जो मन को भीतर तक घायल कर देती हैं. कविता समाज को यह सोचने पर मजबूर करती है कि अपराध केवल स्पर्श से नहीं, बल्कि दृष्टि और मानसिक उत्पीड़न से भी होता है, और ऐसी हर सोच व व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाना जरूरी है.