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ज़िंदगी

समय और दर्द से आकार लेती ज़िंदगी और हाथ में थमी कलम को दर्शाती हिंदी कविता

संध्या यादव, मुंबई

ज़िंदगी

समय की चाक पर

मुझे रखकर,

ठोंककर, पीटकर,

लतियाकर, थपकाकर

जब आकार दे रही थी…

दर्द की पीड़ा रोकने के लिए

मुझे ख़ामोश रखने के लिए

अपनी जेब से निकालकर

मेरे हाथ में थमा दी—

एक कलम…

ठीक वैसे ही,

जैसे सिसकते हुए बच्चे के हाथ में

थमा दिया जाता है

लेमनचूस या टॉफ़ी…

मैं ख़ुश…

वो मस्त—

एक अलिखित समझौता

हम दोनों के बीच…

कलम में

पीड़ा की स्याही भरकर

ज़िंदगी के पन्नों पर

उतारती रही

आड़े-तिरछे शब्द…

ज़िंदगी अब हैरान है—

पन्नों को काला करते

इन शब्दों को देखकर…

और मैं…

मंत्रमुग्ध हूँ

ज़िंदगी के दिए

आकार-प्रकार,

रूप-रंग पर…

शायद उसे ख़बर नहीं—

जिस दर्द से उसने

मुझे ख़ामोश करना चाहा था,

उसी दर्द ने

मेरी कलम को आवाज़ दे दी…

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