
डॉ. शशिकला पटेल, मुंबई
बिहार के सीवान जिले में एक छोटा-सा गाँव मधुपुर, जिसकी सँकरी गलियों में रहने वाली काजल का बचपन अभावों की धूल में बीता था। मिट्टी से पुता छोटा-सा घर, बरसात में टपकती छत और आँगन में पड़ी टूटी चारपाई, यही उसकी दुनिया थी। पिता बुद्धन दिनभर ठेला चलाते थे और माँ अनारो लोगों के घरों में चौका-बर्तन करके परिवार का पेट पालती थीं। चार भाई-बहनों में काजल तीसरे नंबर पर थी। उसकी आँखों में बड़े सपने थे, मगर उन सपनों के नीचे गरीबी की कड़वी सच्चाई दबकर रह जाती थी।
काजल को बचपन से ही नृत्य का शौक था। गाँव में कहीं शादी-ब्याह होता, तो वह दूर खड़ी होकर ढोलक की थाप पर अपने कदम थिरकाने लगती। उसकी बड़ी बहन मंजरी गाना बहुत अच्छा गाती थी। दोनों बहनें अक्सर घर के पीछे आम के पेड़ के नीचे बैठकर गुनगुनातीं और नाचतीं भी। माँ उन्हें देखकर मुस्कुरा देती, लेकिन पिता हमेशा कहते,
“ये सब गरीबों के शौक नहीं होते बेटा… पेट भरना ज्यादा जरूरी है।”
एक दिन अचानक सब बदल गया।
बरसात के मौसम में सड़क फिसलन भरी थी। बुद्धन का ठेला पलट गया और उनका पैर बुरी तरह टूट गया। घर में कमाने वाला कोई नहीं बचा। अस्पताल के बाहर बैठी अनारो की आँखें सूज चुकी थीं। डॉक्टर ने साफ कह दिया था, “कम-से-कम छह महीने तक ये काम नहीं कर पाएँगे।”
घर में कुछ दिन तो चूल्हा जला, मगर एक दिन चूल्हे में न तो धुआँ उठा, न कोई रोटी पकी। पानी पीकर दिन निकालने की नौबत आ गई।
भूख से बिलखते छोटे भाई को देखकर मंजरी की आँखें भर आईं। उसने माँ का हाथ पकड़कर कहा,
“अम्मा, शहर में मेलों और कार्यक्रमों में गाना-बजाना होता है। मैं गाऊँगी… और काजल नाचेगी। कुछ पैसे मिल जाएँगे।”
अनारो सुनकर डर गई। वह समझाने लगी।
“लोग क्या कहेंगे? हमारी बेटियाँ तमाशा करेंगी?”
मंजरी ने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा,
“अम्मा, भूख लोगों की बातों से नहीं मिटती।”
भूख मिटाने के लिए रोटी चाहिए और रोटी के लिए मेहनत चाहिए, अम्मा। वह सिर्फ सुन ही नहीं रही थी, बल्कि समस्या के निदान के बारे में सोच भी रही थी। एक तरफ उसकी नज़रें माँ की तरफ, तो दूसरी तरफ चिंता से व्यग्र चिंतन। चुपचाप चिंतन में समाधान तलाशता मन। अचानक चिंतन पर विराम लग गया।
काजल चुपचाप सब सुन रही थी। उसने माँ के पास जाकर कहा,
“कसम आपकी ममता की। मैं कोई ऐसा काम नहीं करूँगी, जो चरित्र और खानदान के लिए शर्मिंदगी का प्रमाण बन जाए। अम्मा, नृत्य सराहनीय कला है। इस कला के महत्त्व और शिष्ट आचरण पर आँच नहीं आने दूँगी। मैं निश्चल भाव से नाचूँगी। दर्शकों की ओर से जो मिलेगा, उसे आपके चरणों में समर्पित कर दूँगी। बस, मुझे आपकी अनुमति चाहिए।”
“मैं कोई गलत काम नहीं करूँगी अम्मा… बस नाचूँगी।”
माँ ने काँपते हाथों से बेटी का चेहरा छुआ। उस मासूम चेहरे में मजबूरी भी थी और हिम्मत भी। आखिरकार उसने भारी मन से अनुमति दे दी।
पहली बार दोनों बहनें शहर के पास एक छोटे-से मेले में पहुँचीं। चारों तरफ रंग-बिरंगी लाइटें थीं, तेज संगीत था और भीड़ का शोर था। काजल का दिल इतनी तेजी से धड़क रहा था कि उसे लगा वह मंच पर गिर पड़ेगी।
मंजरी ने उसका हाथ थामकर कहा,
“डर मत… आँखें बंद कर और बस संगीत को महसूस कर।”
संगीत शुरू हुआ। काजल ने जैसे ही कदम बढ़ाए, उसके भीतर छिपा दर्द नृत्य बनकर उभर आया। उसके हर भाव में संघर्ष था, हर घूम में भूख की कहानी थी। उसके पाँवों की थिरकन में कलात्मक संस्कृति थी और हृदय-सरोवर में घुँघरुओं की झनक का स्पंदन था। भीड़ कुछ देर के लिए शांत हो गई, फिर अचानक तालियाँ गूँज उठीं।
किसी ने मंच पर सौ रुपये का नोट फेंका।
उस रात वे दोनों बहनें सौ रुपये लेकर घर लौटीं। लक्ष्मी ने काँपते हाथों से नोट पकड़ा और उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
“आज मेरे बच्चों को भूखा नहीं सोना पड़ेगा,” उसने भर्राए गले से कहा।
धीरे-धीरे काजल का नाम आसपास के इलाकों में फैलने लगा। लोग उसे कार्यक्रमों में बुलाने लगे। घर की हालत सुधरने लगी, लेकिन समाज के ताने भी साथ-साथ बढ़ते गए। भूख से मुक्ति मिली, मन हर्षित हुआ, मगर अफसोस कि लोगों की ओछी प्रतिक्रिया से मन खिन्न होने लगा।
पड़ोस के एक व्यक्ति ने यहाँ तक कह डाला,
“देखो, ठेलेवाले की बेटी नाचने लगी है…”
“गरीबी क्या-क्या नहीं करवाती…”
ऐसे ताने, जिसके खिलाफ बोलने की हिम्मत नहीं। वे ताने थे, जो खामोश काजल के मानस को झकझोरते रहे।
काजल हर ताने को चुपचाप सुनती। कई बार रात में अकेले रोती भी, लेकिन अगले दिन फिर मंच पर मुस्कुराकर नाचती। उसे पता था कि उसका नृत्य केवल कला ही नहीं, बल्कि परिवार की जिंदगी का सहारा भी है।
एक दिन शहर के एक बड़े सांस्कृतिक कार्यक्रम में उसकी प्रस्तुति हुई। वहीं बैठे प्रसिद्ध कार्यक्रम आयोजक विक्रम मल्होत्रा की नजर उस पर पड़ी। कार्यक्रम खत्म होने के बाद उन्होंने काजल से पूछा,
“मुंबई चलोगी?”
काजल ने चकित होकर पूछा,
“मुंबई? वहाँ मैं क्या करूँगी?”
विक्रम मुस्कराए।
“तुम्हारे अंदर आग है। अगर सही मंच मिला, तो दुनिया तुम्हें पहचानेगी।”
घर में इस बात को लेकर कई दिनों तक चर्चा हुई। बुद्धन अब थोड़ा चलने लगे थे। उन्होंने बेटी को अपने पास बुलाकर कहा,
“बेटी, गरीबी इंसान के सपनों को मार देती है। अगर तुम्हें मौका मिला है, तो तुम पीछे मत हटना।”
काजल की आँखें भर आईं। उसने पिता के पैर छुए और मुंबई जाने का फैसला कर लिया।
मुंबई की चमक दूर से जितनी सुंदर दिखती थी, पास जाकर उतनी ही कठोर लगती थी। छोटा-सा किराए का कमरा, घंटों की रिहर्सल और हर कदम पर अपमान।
एक दिन अभ्यास के दौरान कोरियोग्राफर चिल्लाया,
“ये गाँव वाला अंदाज़ यहाँ नहीं चलेगा! तुम्हें बदलना पड़ेगा।”
काजल ने पसीना पोंछते हुए कहा,
“सर, मौका तो दीजिए… मैं सीख जाऊँगी।”
और सचमुच उसने सीख लिया। उसने शास्त्रीय नृत्य सीखा, आधुनिक शैली सीखी, शरीर की थकान से लड़ना सीखा और सबसे जरूरी—अपमान सहकर भी मुस्कराना सीखा।
वह कई बार भूखी सोई, कई बार असफल हुई, लेकिन हार नहीं मानी।
कुछ महीनों बाद उसे एक बड़े टीवी डांस रियलिटी शो में हिस्सा लेने का मौका मिला। मंच पर जाने से पहले उसने आँखें बंद कीं। उसे अपना मिट्टी का घर याद आया, माँ के फटे आँचल की खुशबू याद आई और वह पहली रात के नृत्य के सौ रुपये का नोट याद आया।
संगीत बजा।
उस दिन काजल ने केवल नृत्य ही नहीं किया, बल्कि उसने अपनी पूरी जिंदगी मंच पर उतार दी। उसके भावों में दर्द था, संघर्ष था और सपनों की चमक थी।
प्रस्तुति खत्म होते ही पूरा हॉल तालियों से गूँज उठा। जज अपनी सीटों से उठकर खड़े हो गए।
एक जज की आँखें नम थीं। उन्होंने कहा,
“तुम्हारे नृत्य में तकनीक से ज्यादा सच्चाई है… और वही कला की सबसे बड़ी ताकत होती है।”
काजल उस शो की विजेता बनी।
अगले दिन अखबारों में उसकी तस्वीर छपी,
“मधुपुर की बेटी बनी देश की नई डांस स्टार।”
जो लोग कभी ताने मारते थे, अब गर्व से कहते फिरते थे, “वो हमारे गाँव की लड़की है।”
कुछ महीनों बाद काजल अपने गाँव लौटी। पूरे गाँव ने उसका स्वागत किया। स्कूल के मैदान में सम्मान समारोह रखा गया। मंच पर खड़ी काजल ने भीड़ की ओर देखा—वहीं गलियाँ, वही लोग और सामने बैठी उसकी माँ, जिनकी आँखों में गर्व के आँसू थे।
काजल ने माइक पकड़ा और कहा,
“गरीबी ने मुझे बहुत कुछ सिखाया। उसने मुझे झुकाया भी, रुलाया भी… लेकिन मेरे सपनों को नहीं मार सकी। लोग कहते थे कि नाचने से इज़्ज़त चली जाती है, लेकिन मैंने सीखा कि मेहनत कभी इंसान को छोटा नहीं बनाती। छोटा बनाती है हार मान लेने की प्रवृत्ति।”
भीड़ तालियों से गूँज उठी।
काजल मंच से उतरी और माँ से लिपट गई। अनारो ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा,
“आज तेरे बाबूजी होते, तो सबसे ज्यादा खुश वही होते।”
काजल मुस्कुरा उठी, लेकिन उसकी आँखों में आँसू चमक रहे थे।
आज काजल देश की मशहूर नृत्यांगना है। बड़े-बड़े कार्यक्रमों में उसे बुलाया जाता है। लोग उसके साथ तस्वीर खिंचवाने के लिए लाइन लगाते हैं, लेकिन जब भी मंच पर तालियाँ बजती हैं, तब उसे वह पहली रात का वो डांस शो याद आता है, जब सौ रुपये लेकर लौटते समय उसकी माँ की आँखों में राहत चमकी थी।
उसे तब महसूस होता है कि असली सफलता नाम या दौलत में नहीं, बल्कि उन संघर्षों में छिपी होती है, जो इंसान को भीतर से मजबूत बना देते हैं।
