
रुचि अग्रवाल, सिलीगुड़ी (पश्चिम बंगाल)
हाँ,
तुम बिल्कुल वैसे ही हो
जैसा मैंने सोचा था…
तुम्हें पता है,
मुझे फूलों का मुरझाना
ज़रा भी अच्छा नहीं लगता।
फूल तो फूल होते हैं—
मंदिर में चढ़े हों
या किसी की हथेली से
किसी के बालों तक पहुँचे हों।
उनका यूँ चुपचाप
अपनी खुशबू खो देना
मुझे हमेशा उदास करता रहा है।
इसलिए उस दिन
मंदिर से लौटते हुए
गेंदे के कुछ फूल
मैं घर ले आई थी।
सूख गए थे वे…
रंग थोड़ा फीका पड़ गया था,
मगर उनकी पंखुड़ियों में
कुछ पीले-पीले बीज
अब भी ज़िंदा थे।
मैंने उन्हें
तुम्हारी तरह
बहुत संभालकर रखा।
फिर एक शाम
गमले की मिट्टी में
चुपके से दबा दिया।
शायद उस दिन
मैंने बीज नहीं बोए थे…
तुम्हारी कोई छोटी-सी याद
मिट्टी में रख दी थी।
फिर जाने कब
उस मिट्टी ने
उसे अपना लिया।
एक सुबह देखा
मिट्टी के सीने से
एक नन्ही-सी हरियाली
बाहर झाँक रही थी।
मैं देर तक
उसे देखती रही…
सोचा,
कुछ चीज़ें
ख़त्म होकर भी
कहाँ ख़त्म होती हैं!
वक्त बीतता गया,
पत्तियाँ बढ़ती गईं,
शाखें फैलती गईं…
और अब
उन पर कलियाँ आने लगी हैं।
बस कुछ दिन और…
फिर वही पीले फूल खिलेंगे,
जिन्हें कभी
किसी ने भगवान के चरणों में रखा था।
और शायद
मैं उन फूलों में
तुम्हें ढूँढ़ूँगी…
उस पीले रंग में,
उस हल्की-सी खुशबू में,
उस सुबह की धूप में
जो फूलों पर ठहरती है
और देर तक नहीं जाती।
तब शायद समझूँगी
मोहब्बत भी फूल जैसी होती है…
उसे जितना बचाना चाहो,
वह उतनी ही जल्दी
हाथों से फिसलती है।
लेकिन अगर
सच्ची हो…
तो कहीं न कहीं
कोई बीज बचा लेती है।
मिट्टी में सो जाती है,
वक्त का इंतज़ार करती है
और एक दिन…
फिर से खिल जाती है।
बिल्कुल तुम्हारी तरह।
हाँ,
तुम बिल्कुल वैसे ही हो
जैसा मैंने सोचा था…
मेरी उस छोटी-सी उम्मीद जैसे,
जिसे मैंने कभी
किसी से कहा नहीं था
बस
चुपचाप दिल की मिट्टी में
बो दिया था।
और देखो…
आज
उसमें फूल आ गए हैं।
