जनता और नेताओं के रिश्ते पर करारा व्यंग्य

सुशोभित शक्तावत, भोपाल
एक कॉलोनी में मंत्री जी पधारीं। वहाँ के रहवासियों को लगा, साक्षात् देवी आई हैं! यह भारत-देश की कोई भी कॉलोनी हो सकती है। मान लीजिए मेरे घर के आसपास की ही कोई कॉलोनी थी, क्योंकि मैं इस हादसे का चश्मदीद गवाह था और ‘मौक़ा-ए-वारदात’ पर मौजूद था!
तो मंत्री जी आईं। क्यों आईं? क्योंकि रोज़ का यही काम ठहरा। मैंने मंत्री जी का उस दिन का कार्यक्रम देखा। उसी क्षेत्र में कहीं पर भूमिपूजन, कहीं पर शिलान्यास, कहीं पर कूप-खनन, कहीं पर खड़ंजा-निर्माण। हर जगह दस-दस, पन्द्रह-पन्द्रह मिनट का ‘स्टॉपेज’। थोड़ी-सी भाषणबाज़ी। बेमतलब का ज्ञान बघारना। एक नया विचार नहीं, वही घिसी-पिटी कैसेट जो सदियों से चली आ रही है—”भाइयो और बहनो…”
लेकिन कॉलोनीवासियों को उनमें देवी के दर्शन हुए। क्यों हुए? क्योंकि उनमें राजनैतिक-चेतना नहीं थी। बचपन में सब स्कूल गए थे, लेकिन पढ़े-लिखे गँवार थे। इन्हें यह भी न पता था कि यह जो मंत्री है, यह पब्लिक-सर्वेंट है। इसका काम जनता के सामने हाथ जोड़कर खड़े होना है, जनता को उसके हाथ नहीं जोड़ना है। पर कहानी उलट गई है। फिल्मों में हम देखते हैं कि हीरो के साथ एक्सीडेंट होता है तो वह अपनी याददाश्त खो बैठता है। मालूम होता है भारत-देश की जनता भी अपनी याददाश्त खो बैठी है। ख़ुद राजा है, किन्तु स्वयं को प्रजा समझने लगी है। जिसे चाहे पद पर बिठा दे, जिसे चाहे उतार दे, पर अपनी शक्ति को भूल गई है।
तो कॉलोनी के मंदिर के सामने पंडाल लगवाया गया, बैनर-पोस्टर छपवाए गए। सब निजी-वित्त से। उलटे चंद सैकड़ा-हज़ार इसमें ख़र्च हुए। और वह भी मात्र दस मिनटों के कार्यक्रम के लिए। कारपेट बिछाया गया कि कहीं मंत्री जी के चरणकमलों में कोई कंकड़ न चुभ जाए। उनके भेजे को दचका न लगे। पुरुष उस दिन रोज़ के काम पर नहीं गए। कॉलोनी के वॉट्सऐप ग्रुप में संदेश प्रसारित किया गया कि “अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर कार्यक्रम को सफल बनावें।” साथ ही ‘माताओं-बहनों’ (ध्यान रहे कि कॉलोनी में कोई पत्नियाँ, प्रेमिकाएँ, छात्राएँ, सिंगल लड़कियाँ नहीं थीं, केवल माँएँ और बहनें ही थीं, हाँ उनमें से कुछ ‘बेटियाँ’ भी थीं) से विशेष अनुरोध किया गया कि ‘मातृ-शक्ति’ का प्रदर्शन करें। उन्होंने मातृ-शक्ति दिखलाई। कैसे दिखलाई? मंदिर-प्रांगण में ढोलक-पेटी, झाँझ-मँजीरे लाकर बैठ गईं और लगीं भजन गाने। क्यों नहीं? देवी जी जो पधार रही थीं!
और देवी जी आईं! पूरे लवाजमे के साथ आईं। बत्ती वाली गाड़ी, साथ में पुलिस, अर्दली, चमचे और छर्रे। “दीदी ये, दीदी वो” करने वाले। और ‘दीदी’ कैसी? नई-नकोर रेशमी साड़ी। स्निग्ध त्वचा। चेहरे पर तेज। मालाओं से लदी-फदीं। चमत्कृत कर देने वाला रूप था। आकर उन्होंने दसेक मिनट बकैती काटी। कुदाली चलाने का ढोंग करते हुए फोटो खिंचवाया। और सड़क-निर्माण के लिए कुछ राशि की मंज़ूरी दी।
नोट करें, कॉलोनी में मंदिर था, किन्तु सड़क नहीं थी। सड़क का क्या है? उससे बच्चे स्कूल ही तो जाते हैं, लोग काम पर ही तो जाते हैं, बीमार अस्पताल ही तो जाते हैं। उसमें कुछ ख़ास बात नहीं। मंदिर बनाना पहले ज़रूरी था।
मंत्री ने राशि मंज़ूर की तो जय-जयकार गूँज उठी, मानो वे महोदया अपने बटुए से दे रही हों। विधायक-निधि की राशि थी, सड़क आदि निर्माण के लिए ही सरकार हर विधायक-मंत्री को देती है। वो न ख़र्च करें तो पैसा डूब जावे। और सरकार के पास पैसा कहाँ से आता है? जनता का ही पैसा है, जो टैक्स आदि से जुटाया जाता है। यानी जनता के ही पैसों से, जनता के लिए मंत्री ने सड़क-निर्माण के लिए राशि मंज़ूर की—जो कि उनकी नौकरी थी—फिर भी जय-जयकार गूँज उठी। उनके जाने के बाद मिठाई-वितरण हुआ। ये दो किलो लड्डू भी किसी ज्ञानचन्द ने निजी-वित्त से मँगवाए थे। वह लड्डू-वितरण कुछ इस अंदाज़ में हुआ, जैसे प्रसाद-वितरण हो!
मेरा लड़का मेरे साथ यह दृश्य देख रहा था। उसकी सोशल-साइंसेस के इम्तिहान चल रहे थे। एमपीज़-एमएलएज़ के बारे में वो पढ़ रहा था। उसने पूछा कि “पापा, ये कॉलोनी वाले मंत्री को ऐसे ट्रीट क्यों कर रहे हैं, जैसे कि वो कुछ स्पेशल हों और उन पर कुछ एहसान कर रही हों?” मैंने कहा, “बेटा, इन लोगों में पोलिटिकल-कॉन्शसनेस नहीं है। ये अभी भी सदियों पुराने राजशाही-सामंतशाही के युग में जी रहे हैं और ज़ेहनी तौर पर ग़ुलाम हैं! डेमोक्रेसी का ‘ड’ इनको समझ नहीं आया है।”
मेरा लड़का बोला : “दैट्स व्हाय, एजुकेशन इज़ इम्पोर्टेंट!”
अब बताइए, घर में ही एक ‘दिमाग़ी-नक्सल’ पल रहा है, इस देश का क्या होगा!!
