किसको ढोओगे
यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।

यह कविता सत्ता के अहंकार, चुनावी राजनीति और सामाजिक विभाजन पर तीखे सवाल खड़े करती है। “किसको ढोओगे” आम जनता की आवाज़ बनकर लोकतंत्र के मूल्यों की याद दिलाती है।
समुद्र की तरह व्यापक है हमारा वजूद, बस ज़रूरत है उसमें छिपे मोतियों को पहचानने की। जिसकी तलाश में हम दुनिया भर भटकते हैं, वह ख़ुद हमारे भीतर ही छिपा होता है सुकून भी, ख़ुदा भी। भटकते-भागते जीवन में कभी-कभी घर लौटकर देखना चाहिए, शायद वही ठहराव का असली स्थान हो। मन उदास हो तो आकाश की तरफ देखो—वही विशालता दिल को हल्का कर देती है। हार से पहले हार मत मानो; अवसर लौट-लौट कर आते हैं।
26 नवम्बर का दिन हमारे लोकतंत्र के इतिहास में विशेष महत्व रखता है। इसी दिन 1949 में भारतीय संविधान को अंगीकार किया गया था। किताबों में हमने पढ़ा कि यह संविधान हमें मौलिक अधिकार देता है. बोलने की स्वतंत्रता, जीने का अधिकार, धर्म मानने की आज़ादी, समानता का अधिकार और भी बहुत कुछ। लेकिन जैसे-जैसे जीवन को समझा और समाज को करीब से जाना, महसूस हुआ कि किताबों और असल ज़िंदगी के बीच एक खाई है।
महिदपुर विधानसभा क्षेत्र के महिदपुर रोड में गुरुवार को कांग्रेस कार्यकर्ताओं द्वारा मतदाता जागरूकता अभियान के अंतर्गत प्रभात फेरी निकाली गई. इस अवसर पर कार्यकर्ताओं ने लोगों से अपने नाम मतदाता सूची में जुड़वाने और मतदान के प्रति सजग रहने का आह्वान किया. कार्यक्रम का नेतृत्व विधानसभा क्षेत्र के वरिष्ठ कांग्रेस नेता महेश परमार और महिदपुर विधानसभा के विधायक दिनेशचंद्र बोस ने किया.