लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़

झुकी हुई रीढ़ के प्रतीक के रूप में लोकतंत्र, चुनावी रैली, भीड़ और मंच पर खड़े नेता का व्यंग्यात्मक दृश्य

कांता राय, भोपाल

लोकतंत्र इन दिनों चुनावी मौसम में फिर से सजाया जा रहा है। उसकी रीढ़ वर्षों से जनता के भरोसे पर खड़ी थी, पर अब उसे रैलियों के मंच पर झुकाने की कवायद चल रही है। हर ओर विशाल पंडाल हैं, ऊँचे कटआउट हैं, हवा में उड़ते वादे हैं, और मंच पर खड़े वे लोग हैं जो लोकतंत्र को प्रणाम कम, प्रदर्शन ज्यादा कर रहे हैं।
चुनावी रैलियाँ अब संवाद का माध्यम नहीं रहीं, वे शक्ति-प्रदर्शन के मेले हैं, जहाँ भीड़ गिनी जाती है, नागरिक नहीं, नारे तौले जाते हैं, विचार नहीं और कैमरे तय करते हैं कि जनसमर्थन कितना है। लोकतंत्र की रीढ़ से पूछा नहीं जाता कि वह सीधी रहना चाहती है या नहीं, बस उसे भीड़ के वजन से मोड़ दिया जाता है।
जन कल्याणकारी योजनाओं का हाल भी निराला है। जिन योजनाओं का उद्देश्य नागरिक जीवन को सशक्त करना था, उन्हें चुनावी सौंदर्य प्रसाधन बना दिया गया है। कहीं राशन का उबटन लगाया जा रहा है, कहीं नकद सहायता का तेल मल दिया गया है, कहीं मुफ्त योजनाओं की क्रीम पोती जा रही है। जनता को बताया जा रहा है, “देखिए, आपकी त्वचा चमक रही है।” जनता आईना देखती है तो पाती है कि चमक नहीं, परत उतर रही है।
लोकतंत्र रूपी शरीर की त्वचा अब इतनी बार घोषणाओं से रगड़ी जा चुकी है कि छिलकों की तरह उतरने लगी है। नीचे से लालिमा नहीं, घाव झलकते हैं, बेरोज़गारी के, महँगाई के, शिक्षा के अभाव के, स्वास्थ्य व्यवस्था की थकान के। मगर मंच से उद्घोषणा होती है, “देश पहले से ज्यादा स्वस्थ है।” शायद बीमारी की परिभाषा भी चुनाव आयोग से प्रमाणित करानी होगी।
रक्त, मज्जा और श्रम से बनी जनता की रक्तिम काया को अब नए बाजार में उतारा जा रहा है। वोटर अब नागरिक नहीं, ग्राहक है, घोषणा पत्र ऑफर बुकलेट है, उम्मीदवार सेल्समैन है और चुनावी रैली उद्घाटन समारोह। कोई कहता है, “एक वोट दीजिए, पाँच साल सुविधा पाइए।” दूसरा कहता है, “हमसे लीजिए, साथ में राष्ट्रवाद मुफ्त।” तीसरा फुसफुसाता है, “हमारे पास विकास का कॉम्बो पैक है।”
मंचों पर भाषा भी बदल गई है। नीति की जगह पैकेज, अधिकार की जगह लाभ, भागीदारी की जगह लाभार्थी, और संविधान की जगह ब्रांडिंग ने ले ली है।
जनता से कहा जाता है, “आप मालिक हैं।” फिर अगली ही पंक्ति में जोड़ा जाता है, “बस इस बार भी हमें ही चुनिए।” मालिक को हर पाँच साल बाद अपनी मालिकी साबित करनी पड़ती है।
रैलियों की भीड़ देखकर नेताओं की छाती चौड़ी होती है, पर लोकतंत्र की साँस फूल जाती है। सड़कें बंद, स्कूल बंद, दफ्तर ठप, यातायात जाम, पर इसे जनउत्सव कहा जाता है। जनता पसीने में खड़ी रहती है, मंच पर वातानुकूलित राष्ट्रभक्ति बहती रहती है।
यह भी कम व्यंग्य नहीं कि जिन योजनाओं के लिए जनता कर देती है, वही योजनाएँ चुनाव के समय नेताओं के निजी उपहार की तरह बाँटी जाती हैं। मानो सरकारी खजाना नहीं, पुश्तैनी तिजोरी हो। जनता का पैसा जनता को देकर एहसान जताया जाता है, और जनता से ताली भी अपेक्षित रहती है।
लोकतंत्र का शरीर घायल है, पर मेकअप जारी है। रीढ़ झुकी हुई है, पर कैमरा एंगल सीधा रखा गया है। त्वचा उतर रही है, पर पोस्टर चमकदार हैं। भीतर रक्तस्राव है, बाहर आतिशबाज़ी।
फिर भी आशा बची है, क्योंकि जनता कभी-कभी ग्राहक की भूमिका छोड़कर नागरिक बन जाती है। जब वह भीड़ से बाहर निकलकर सवाल पूछती है, तब मंच की रोशनी फीकी पड़ जाती है। जब वह घोषणा नहीं, हिसाब माँगती है, तब लोकतंत्र की रीढ़ फिर सीधी होने लगती है।
वरना चुनावी बाजार तैयार है, नई पैकिंग, पुराने वादे, सीमित स्टॉक, शर्तें लागू।

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