समाज
चूल्हे से किताब तक
खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…
डिलीवरी बॉय
जब हम आराम से घर में होते हैं, तब भी कोई हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों पर होता है। यह लेख डिलीवरी बॉय के संघर्ष, मेहनत और समर्पण की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।
रिश्तों की सच्चाई
यह कविता जीवन की भागदौड़ में खोती इंसानियत को जगाने का प्रयास है। इसमें रिश्तों की सच्चाई, अहंकार से परे जाकर दूसरों को समझने और साथ देने का गहरा संदेश छिपा है।
न्याय चेतना
“न्याय चेतना” एक विचारोत्तेजक लेख है, जो बताता है कि हम अक्सर दूसरों, अपनों और स्वयं के लिए अलग-अलग न्याय क्यों करते हैं। यह लेख निष्पक्षता, मानवता और धर्म के माध्यम से सच्चे न्याय की दिशा दिखाता है।
यह भी ज़िन्दगी है
“यह भी ज़िन्दगी है” एक ऐसी स्त्री की कहानी है, जो कम उम्र में विवाह, तानों और जिम्मेदारियों के बीच अपने सपनों को जीने की कोशिश करती है। यह कहानी हर उस महिला की आवाज़ है, जो चुप रहकर भी बहुत कुछ सहती है।
सपनों का चौकीदार
यह कहानी एक बूढ़े मजदूर और एक संवेदनशील लेखक के संवाद के जरिए जीवन, संघर्ष और उम्मीद की सच्चाई को बेहद मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करती है।
…खटकने लगोगे
यह रचना उस क्षण की सच्चाई बयान करती है जब व्यक्ति दूसरों की अपेक्षाओं से बाहर निकलकर अपनी राह चुनता है। जैसे ही कोई अपने सपनों, अपनी आवाज़ और अपने आत्मसम्मान के लिए खड़ा होता है, वही समाज उसे चुभने वाला मानने लगता है। लेख जीवन की कमान अपने हाथ में रखने और स्वार्थी दुनिया की पहचान करने की सशक्त सीख देता है।
मिट्टी की खुशबू रोती रही
यह कविता गाँव से शहर बने समाज की उस पीड़ा को उजागर करती है, जहाँ पक्के मकानों के बीच रिश्ते कच्चे होते चले गए। मिट्टी की खुशबू, चूल्हे का धुआँ और अपनापन सब कुछ शहरी भीड़ में कहीं खो सा गया है।
