नए घर में अकेली बैठी एक भारतीय नवविवाहिता, चेहरे पर चिंता और भावनात्मक संघर्ष का भाव, घरेलू परिवेश की पृष्ठभूमि।

बहू भी इंसान है

शादी केवल नए रिश्तों की शुरुआत नहीं, बल्कि एक स्त्री के लिए नए संघर्षों की भी शुरुआत हो सकती है। यह लेख बहू के भावनात्मक संघर्ष, अपेक्षाओं और ससुराल व्यवस्था पर जरूरी सवाल उठाता है।

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आत्मचिंतन और करुणा के भावों से भरी एक भारतीय महिला की प्रतीकात्मक छवि, जो सृजन और संवेदना का संदेश दे रही है।

जननी से जगजननी तक

आज के परिवेश में कुछ नारियाँ भी भयावह कांड करने वाली हो गई हैं। विविध अशोभनीय, असंवेदनशील और निर्दयी घटनाओं को देखकर हृदय द्रवित हो उठता है। पर ऐसा होने के पीछे दशकों से नारी पर किए गए अत्याचारों का परिणाम भी कहा जा सकता है, जिसके कारण वह असहनशील और संवेदनाहीन होकर जघन्य अपराध कर रही हैं। पर संभलना तो होगा उन नारी रूपों को, जो ऐसे कृत्य कर रही हैं।

क्योंकि, हे नारी! तू ही तो सृष्टि की आधारशिला है। यदि तू ही अपने जन्मे बच्चों को खा जाएगी, तो यह सृष्टि आगे कैसे बढ़ेगी? सृष्टि ही समाप्त हो जाएगी, क्योंकि तू ही तो जननहारी है। इन्हीं भावों को निम्न कविता में समेटने का प्रयास किया है नारी को चैतन्य करने के लिए….

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परीक्षा केंद्र के बाहर सुरक्षा जांच से गुजरते भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर चिंता, उम्मीद और आत्मसम्मान के भाव दिखाई दे रहे हैं।

सपनों पर चलती लाठियाँ

यह कविता उन विद्यार्थियों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती है, जो सपनों और उम्मीदों का बोझ लेकर शिक्षा के मंदिरों तक पहुँचते हैं, लेकिन कई बार सम्मान के बजाय संदेह और कठोरता का सामना करते हैं। कविता शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशील संवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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झुकी हुई रीढ़ के प्रतीक के रूप में लोकतंत्र, चुनावी रैली, भीड़ और मंच पर खड़े नेता का व्यंग्यात्मक दृश्य

लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़

लोकतंत्र आज एक ऐसे दौर से गुजर रहा है, जहाँ उसकी रीढ़ भीड़ और दिखावे के बोझ तले झुकती नजर आती है। चुनावी रैलियाँ संवाद नहीं, शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन गई हैं, जहाँ नागरिकों को गिना जाता है, समझा नहीं जाता। जनकल्याणकारी योजनाएँ अधिकार नहीं, बल्कि चुनावी उपहार की तरह परोसी जा रही हैं। इस पूरे परिदृश्य में मतदाता धीरे-धीरे ग्राहक में बदलता जा रहा है। फिर भी उम्मीद कायम है जब जनता सवाल पूछती है और अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होती है, तभी लोकतंत्र की झुकी हुई रीढ़ फिर से सीधी होने लगती है।

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अहंकार में डूबा व्यक्ति, चारों ओर धूल और धुंध, पीछे जलती हुई बगिया और प्रतीकात्मक अराजकता

आत्ममुग्धता

धूल जब गगन को छूती है, तब भी एक कंकर अपनी ही धुन में डूबा रहता है यही आत्ममुग्धता है। इस दुनिया में कई लोग अपने अहंकार के कहकहे लगाते हैं, बिना यह देखे कि उनकी ही कारगुजारियाँ उनके आसपास के चमन को जला रही हैं। वे उस बगिया को बारूद बना देते हैं, जिसे प्रेम और बलिदान से सींचा गया था यही हमारी सामाजिक विडंबना है।

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एक छोटी लड़की चूल्हे और किताबों के बीच खड़ी, पढ़ाई और अपने सपनों की ओर बढ़ने की इच्छा दर्शाती हुई।

चूल्हे से किताब तक

खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…

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रात के समय सुनसान सड़क पर बाइक से डिलीवरी करता एक युवक, मेहनत और जिम्मेदारी को दर्शाता दृश्य।

डिलीवरी बॉय

जब हम आराम से घर में होते हैं, तब भी कोई हमारी जरूरतों को पूरा करने के लिए सड़कों पर होता है। यह लेख डिलीवरी बॉय के संघर्ष, मेहनत और समर्पण की सच्ची तस्वीर प्रस्तुत करता है।

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एक व्यक्ति दूसरों को सहारा देते हुए पेड़ की छाँव में बैठा, इंसानियत और सहानुभूति का प्रतीक दृश्य।

रिश्तों की सच्चाई

यह कविता जीवन की भागदौड़ में खोती इंसानियत को जगाने का प्रयास है। इसमें रिश्तों की सच्चाई, अहंकार से परे जाकर दूसरों को समझने और साथ देने का गहरा संदेश छिपा है।

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न्याय का प्रतीक तराजू, एक ओर झुका हुआ संतुलन, विचारशील वातावरण

न्याय चेतना

“न्याय चेतना” एक विचारोत्तेजक लेख है, जो बताता है कि हम अक्सर दूसरों, अपनों और स्वयं के लिए अलग-अलग न्याय क्यों करते हैं। यह लेख निष्पक्षता, मानवता और धर्म के माध्यम से सच्चे न्याय की दिशा दिखाता है।

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