
सुमित्रा गुप्ता सखी
कुछ घटनाएँ हृदय विदीर्ण कर देती हैं,
संवेदनाओं की धार ही मानो हर लेती हैं।
जब ममता का आँचल रक्तरंजित हो जाता है,
मानवता का अस्तित्व ही प्रश्न बन जाता है।
पति का वध, संतानों का संहार
कैसे सह ले यह पीड़ित संसार?
क्या क्रोध ने करुणा को हर लिया है,
या विवेक ने स्वयं को त्याग दिया है?
हे नारी! तुम सृष्टि की आधारशिला हो,
त्याग, प्रेम और धैर्य की मधुर कला हो।
तुमसे ही जीवन का मधुबन महकता है,
तुमसे ही हर आँगन स्वर्ग-सा दिखता है।
क्यों विनाश की राह पर बढ़ती जाती हो?
क्यों अपने ही घर को आग लगाती हो?
जागो, अपने पावन स्वरूप को पहचानो,
करुणा, ममता और सत्य को फिर जानो।
यद्यपि पुरुषों ने भी युगों से अनेकों पाप किए हैं,
अत्याचारों के असंख्य अभिशाप दिए हैं।
लगता है प्रकृति उसका प्रतिदान कर रही है,
कर्मों का लेखा-जोखा स्वयं धर रही है।
परंतु प्रतिशोध समाधान नहीं होता,
विनाश से कोई कल्याण नहीं होता।
सद्विवेक और सन्मति को जगाओ,
प्रेम से अपने जीवन को सजाओ।
तुम जननी हो, तुम ही पालनहार,
तुमसे ही सुरक्षित है यह संसार।
सखी, परिवारों को खुशहाल बनाओ,
सखी, मानवता का दीप सदा जलाओ।
हे नारी! अपने स्वरूप को पहचानो,
विनाश नहीं, सृजन का पथ अपनाओ।
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