
सुरेश परिहार, पुणे
कुछ रिश्ते अचानक पैदा नहीं होते.वे धीरे-धीरे शब्दों के बीच सांस लेने लगते हैं.पहले एक साधारण परिचय होता है, फिर इंतजार, फिर आदत और एक दिन एहसास होता है कि सामने वाला व्यक्ति अब केवल बातचीत का हिस्सा नहीं, बल्कि दिल की धड़कनों में शामिल हो चुका है.रिधिमा और उस लड़के की कहानी भी कुछ ऐसी ही थी.शुरुआत बिल्कुल सामान्य थी.एक दिन सोशल मीडिया पर हाय से बातचीत शुरू हुई. फिर हालचाल, रोजमर्रा की बातें और समय काटने वाली छोटी-छोटी चर्चाएँ. उस समय दोनों ने शायद ही सोचा होगा कि यह साधारण-सी बातचीत एक दिन उनके भीतर इतनी गहरी जगह बना लेगी.
रिधिमा अपनी कविताओं, संवेदनाओं और जीवन के अनुभवों के साथ बात करती थी. उसके शब्दों में एक अजीब-सी गर्माहट थी. वह जितनी सहज दिखाई देती थी, उतनी ही भीतर से टूटी हुई भी थी. लड़का धीरे-धीरे उसकी बातों में छुपे अकेलेपन को महसूस करने लगा. उसे लगने लगा कि यह स्त्री केवल मुस्कुराती नहीं, बल्कि अपनी मुस्कान के पीछे बहुत कुछ छुपाती भी है.शुरुआत में वह सिर्फ उसकी बातों को पसंद करता था. फिर उसकी प्रतीक्षा करने लगा. उसके संदेश दिन का सबसे खूबसूरत हिस्सा बनने लगे.यहीं से ग़ज़ल का पहला एहसास जन्म लेता है
रफ़्ता रफ़्ता वो मिरी हस्ती का सामॉं हो गए,
पहले जॉं फिर जान-ए-जॉं फिर जान-ए-जानॉं हो गए.
धीरे-धीरे रिधिमा उसकी आदत बनती चली गई. पहले वह सिर्फ एक परिचित थी. फिर अच्छी दोस्त बनी. फिर उसकी हर खुशी और उदासी उस लड़के के मन को छूने लगी. उसे महसूस होने लगा कि दिन चाहे कितना भी व्यस्त हो, अगर रिधिमा से बात न हो तो भीतर कुछ अधूरा रह जाता है.रिधिमा भी इस बदलाव को महसूस कर रही थी.
वह हर किसी से इतनी खुलकर बात नहीं करती थी. जीवन ने उसे बहुत जल्दी परिपक्व बना दिया था. अधूरी पढ़ाई, जिम्मेदारियॉं, टूटे भरोसे और रिश्तों की जटिलताओं ने उसे सतर्क रहना सिखा दिया था. इसलिए वह हर भावनात्मक कदम बहुत संभलकर रखती थी.
लेकिन उस लड़के में उसे एक अलग अपनापन दिखाई देने लगा.वह उसकी बातों को केवल सुनता नहीं था, महसूस भी करता था. उसकी छोटी-छोटी तकलीफों को समझता था. उसकी कविताओं के पीछे छुपे दर्द को पढ़ लेता था. धीरे-धीरे बातचीत का स्वर बदलने लगा.अब केवल शब्द नहीं, भावनाएँ भी चलने लगीं.रातें लंबी होने लगीं और बातें गहरी.आप तो नज़दीक से नज़दीक-तर आते गए,पहले दिल फिर दिल-रुबा फिर दिल के मेहमॉं हो गए.
अब दोनों एक-दूसरे के जीवन का हिस्सा बनने लगे थे.रिधिमा उसे अपने पुराने डर, अधूरे सपने और मन की उलझनें बताने लगी. लड़का उसे समझाने लगा कि वह जितना खुद को साधारण समझती है, वास्तव में उससे कहीं अधिक गहरी और खूबसूरत है.
रिधिमा के भीतर भी एक कोमल लगाव जन्म लेने लगा था.वह उसका इंतजार करने लगी. उसकी चिंता करने लगी. उसके संदेश पढ़कर मुस्कुरा देने लगी. लेकिन हर बार खुद को संभाल भी लेती, क्योंकि वह जानती थी कि भावनाएँ जितनी खूबसूरत होती हैं, टूटने पर उतनी ही तकलीफ भी देती हैं.
फिर एक समय ऐसा आया जब दोनों के बीच औपचारिकताएँ धीरे-धीरे खत्म होने लगीं.शब्दों में झिझक कम हो गई.दिल की बातें सहज होने लगीं.प्यार जब हद से बढ़ा सारे तकल्लुफ़ मिट गए, आप से फिर तुम हुए फिर तू का उनवॉं हो गए.अब रिश्ता केवल दोस्ती नहीं रहा था.
वह एक ऐसी आत्मीयता में बदल चुका था जिसमें बिना कहे भी बहुत कुछ समझा जाने लगा था. दोनों शायद खुलकर मोहब्बत शब्द नहीं कहते थे, लेकिन उनके बीच जो था, वह दोस्ती से कहीं ज्यादा गहरा था.
लड़का अब रिधिमा को केवल एक स्त्री की तरह नहीं देखता था, बल्कि एक ऐसी आत्मा की तरह महसूस करता था जिसने बहुत कुछ सहकर भी अपने भीतर की कोमलता बचाकर रखी थी. और रिधिमा को भी उसके भीतर एक ऐसा व्यक्ति दिखाई देने लगा था जो उसे बदलना नहीं चाहता था, सिर्फ समझना चाहता था.यही इस रिश्ते की सबसे खूबसूरत बात थी.यह प्रेम अचानक नहीं आया था.यह धीरे-धीरे बातचीत, भरोसे, इंतजार, अपनापन और भावनात्मक निकटता से जन्मा था. ठीक उसी तरह जैसे ग़ज़ल में प्रेम धीरे-धीरे पहचान से दिल और फिर आत्मा तक पहुँचता है.

क्या बात👌
अप्रतिम अद्भुत