गाँव के घर के बाहर प्रतीक्षा करते बुजुर्ग माता-पिता और मिट्टी, पेड़ों व अपनापन से भरा ग्रामीण दृश्य।

चलो चलें अब गाँव

यह कविता गाँव की मिट्टी, रिश्तों की गर्माहट और अपनों के स्नेह की ओर लौटने की भावनात्मक पुकार है। शहर की भागदौड़ में छूट गए गाँव, बूढ़े माता-पिता और सूने खलिहानों की याद मन को बार-बार अपनी जड़ों की ओर खींचती है। कविता बताती है कि गाँव में रिश्ते दिखावे से नहीं, बल्कि विश्वास और प्रेम से निभाए जाते हैं, जहाँ सुख-दुख बाँटकर जीवन जिया जाता है। पीपल, बरगद और आम की छाँव, शुद्ध हवा और मिट्टी का सहज स्पर्श उस आत्मीय सुख का एहसास कराते हैं, जो कहीं और दुर्लभ है।

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खिड़की के पास बैठी लड़की और मोबाइल में खोया लड़का, सोशल मीडिया से जन्मी मोहब्बत का एहसास.

रफ़्ता-रफ़्ता तुम दिल में उतर गए

एक साधारण हाय-हैलो से शुरू हुई बातचीत कैसे धीरे-धीरे गहरी दोस्ती और फिर मोहब्बत में बदल गई. रिधिमा और एक लड़के की संवेदनशील, भावुक और आत्मिक प्रेम कहानी पढ़िए.

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कुछ अनकही …

सब ठीक है होने और सब ठीक है कहने में बहुत फर्क होता है। अक्सर हम हँसी के पीछे छिपी खामोशी नहीं पढ़ पाते। कोई पूछे“कैसे हो?” और हम सिर हिलाकर हाँ कह दें, तो समझिए, आधी पीड़ा वहीं मौन में कैद रह जाती है।

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दीवार

कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।

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जज़्बातों का मेला है ज़िंदगी

ज़िंदगी कोई साधारण चीज़ नहीं, यह भावनाओं, यादों, रिश्तों और एहसासों का कुल योग है। यह क़ीमती भी है, तकलीफ़देह भी है, लेकिन हर पल हमारे बहुत पास है।

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बे-इख़्तियार मोहब्बत

मोहब्बत अजीब है…जिन्हें हमारी कद्र नहीं, हम वहीं अपनी रूह रख आते हैं।हम उनके लिए हर लम्हा ख़यालों में सुलगते रहते हैं,और वो हमारी बे-ख़ुदी की ख़बर तक नहीं लेते। शिकायत भी नहीं कर सकते…क्योंकि इश्क़ में इख़्तियार हमारा होता ही कहाँ है।

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बड़की

संयुक्त परिवार की रसोई सिर्फ़ खाना पकाने की जगह नहीं होती, वहाँ रिश्तों की आँच भी सुलगती है।
सुनीता को आज समझ आया कि कमाना ही पर्याप्त नहीं, घर के कामों में हाथ बँटाना भी उतना ही ज़रूरी है। बड़ी भाभी ललिता की चुप्पी में शिकायत नहीं, थकान छिपी थी उस जिम्मेदारी की जो उन्होंने बरसों से बिना शोर उठाई थी। कभी-कभी रिश्तों में तकरार इसलिए नहीं होती कि कोई गलत है, बल्कि इसलिए कि कोई दूसरे की थकान देख नहीं पाता।

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