चूल्हे से किताब तक

एक छोटी लड़की चूल्हे और किताबों के बीच खड़ी, पढ़ाई और अपने सपनों की ओर बढ़ने की इच्छा दर्शाती हुई।

खुशबू गोयल

माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,
पापा, आप ही समझाओ न।
नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,
ज़रा कलम तो पकड़ाओ न।

भैया भी तो पढ़ने जाता है,
मुझको भी तो पढ़ाओ न।
माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,
पापा, आप ही समझाओ न।

मेरे भी तो सपने हैं,
करने उनको अपने हैं।
मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,
विद्यालय में मेरा दाख़िला करवाओ न।
माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,
पापा, आप ही समझाओ न।

मैं पढ़ूँगी, लिखूँगी,
खुले आसमान में उड़ूँगी।
अपने नाम से आपकी पहचान गढ़ूँगी,
मुझ पर थोड़ा विश्वास दिखलाओ न।
माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,
पापा, आप ही समझाओ न।

एक कलम की चाह है मुझको,
तलाश भविष्य की राह की है मुझको।
मत बाँधो घर की दीवारों में मुझको,
मंज़िल तक पहुँचा दो न।
माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,
पापा, आप ही समझाओ न।

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