सांवला रंग

“सांवला रंग” एक प्रेरक लघुकथा है जो समाज में व्याप्त रंगभेद की मानसिकता पर गहरा प्रहार करती है। कहानी में एक माँ अपने जीवन में झेले गए तिरस्कार को याद करते हुए संकल्प लेती है कि उसकी बेटी की पहचान उसके रंग से नहीं, बल्कि उसकी प्रतिभा और उपलब्धियों से होगी। वर्षों की मेहनत और समर्पण का परिणाम तब सामने आता है जब उसकी बेटी आई.पी.एस. अधिकारी बनकर पूरे शहर का गौरव बन जाती है।

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परीक्षा केंद्र के बाहर सुरक्षा जांच से गुजरते भारतीय विद्यार्थी, जिनके चेहरों पर चिंता, उम्मीद और आत्मसम्मान के भाव दिखाई दे रहे हैं।

सपनों पर चलती लाठियाँ

यह कविता उन विद्यार्थियों की पीड़ा और संघर्ष को स्वर देती है, जो सपनों और उम्मीदों का बोझ लेकर शिक्षा के मंदिरों तक पहुँचते हैं, लेकिन कई बार सम्मान के बजाय संदेह और कठोरता का सामना करते हैं। कविता शिक्षा व्यवस्था, अनुशासन और संवेदनशील संवाद के बीच संतुलन की आवश्यकता पर गहरा प्रश्न उठाती है।

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एक छोटी लड़की चूल्हे और किताबों के बीच खड़ी, पढ़ाई और अपने सपनों की ओर बढ़ने की इच्छा दर्शाती हुई।

चूल्हे से किताब तक

खुशबू गोयल माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न।नहीं पकड़नी ये करछी मुझको,ज़रा कलम तो पकड़ाओ न। भैया भी तो पढ़ने जाता है,मुझको भी तो पढ़ाओ न।माँ, थोड़ी तो दया करो मुझ पर,पापा, आप ही समझाओ न। मेरे भी तो सपने हैं,करने उनको अपने हैं।मत सुलगाओ चूल्हे की अग्नि में मुझको,विद्यालय…

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ज्ञान का कलित वर्णन

यह कविता ज्ञान को रूप, रस, शब्द, अनुभव और विवेक के समग्र स्वरूप में प्रस्तुत करती है। बालक के ‘क, ख, ग’ से लेकर विद्वान की विरासत तक ज्ञान को जीवन, संघर्ष, विनम्रता और सहानुभूति की निरंतर यात्रा के रूप में रेखांकित करती है।

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शान-ए-कानपुर और कानपुर रत्न सम्मान समारोह

कानपुर के हरिहरनाथ शास्त्री भवन में शहीद-ए-आज़म सरदार भगत सिंह के 118वें जन्मोत्सव के अवसर पर एक भव्य समारोह आयोजित किया गया। इस अवसर पर शान-ए-कानपुर सम्मान और कानपुर रत्न सम्मान प्रदान किए गए। मुख्य अतिथि श्री किरणजीत सिंह सरदार (भगत सिंह के भतीजे) ने शहीद भगत सिंह के अद्वितीय बलिदान और क्रांतिकारी विचारों को उजागर किया और युवा पीढ़ी को उनके आदर्शों से प्रेरणा लेकर राष्ट्र निर्माण में योगदान देने की प्रेरणा दी। कार्यक्रम में समाज के विभिन्न क्षेत्रों — साहित्य, कला, शिक्षा, मनोरंजन, चिकित्सा, खेल, समाज सेवा — के लोगों को सम्मानित किया गया। उपस्थित जनों ने शहीदों के सपनों के भारत निर्माण में सक्रिय भूमिका निभाने का संकल्प लिया। गोल्डन क्लब ने रक्तदान, अंगदान और देहदान जैसे सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूकता बढ़ाने की मुहिम जारी रखने की घोषणा की।

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हस्‍तरेखा

मां के बहुत कहने पर उसने बाबा के सामने हथेली फैलाई। बाबा ने ध्यान से रेखाएँ देखीं और मुस्कराए
“अरे वा! बहुत सुंदर रेखाएँ हैं बिटिया, खूब सुख-संपत्ति और अच्छा पति मिलेगा।” वह अचानक बीच में बोल उठी—“विद्या की रेखा कहाँ है मेरे हाथ में, बताइए तो ज़रा?”बाबा ठिठक गए।“बिटिया, तुम्हारे नसीब में सब कुछ है, विद्या को छोड़कर।”उसकी आँखों में चमक आ गई।

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मेरी माँ 

मेरी माँ घर से बाहर तो जाती हैं, लेकिन घर को घर पर छोड़ नहीं पातीं। उनकी गृहस्थी उनकी परछाई की तरह हमेशा उनके साथ रहती है। रसोई उनके लिए वह जगह है, जहाँ बच्चे जैसी मासूमियत और स्नेह बसता है। लोग कह सकते हैं कि वह सिर्फ एक गृहिणी हैं, पर मेरी माँ केवल गृहिणी नहीं, मेरी जीवनी हैं।
उन्होंने मुझे इतिहास, भूगोल और गणित की बारीकियाँ, साहस, सहिष्णुता और समग्र दृष्टि दी। लगभग सभी विषयों का ज्ञान और जागरूकता उन्होंने मुझे प्रदान की। इस पूरी प्रक्रिया में मेरे पिता भी मेरे और माँ के विकास में साथ रहे।

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हिंदी में हँसी, हिंदी में प्यार

आज हिंदी दिवस पर सबको याद दिलाएँ – अंग्रेज़ी नहीं, अपनी प्यारी हिंदी बोलें! बात करें, हँसी-मज़ाक करें और इसे दिल से अपनाएँ। क्योंकि हिंदी है हमारी भाषा, हमारी पहचान।”

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हिंदी पर बिंदी

हम सभी मिलकर हिंदी को अपना अत्यंत महत्वपूर्ण भाषा बनाना चाहते हैं। केवल अंग्रेज़ी के सहारे हमारा देश नहीं चमक सकता, इसलिए हमें हिंदी को आगे लाना होगा। आज से हम अपने सभी कार्य हिंदी में करेंगे और इसे देश की सर्वश्रेष्ठ पहचान दिलाएंगे। जब हम सभी हिंदी में संवाद करेंगे और अपने काम इसी भाषा में करेंगे, तभी देश का विकास वास्तविक रूप से संभव होगा। यह हमारा दृढ़ संकल्प है कि अंग्रेज़ी को राजभाषा मानने के बजाय हम हिंदी को अपनाएँगे और इसे सभी के बीच फैलाएँगे।

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दिलों को जोड़ती, नफरतों को तोड़ती हिंदी

हिंदी अपनी निर्बाध गति से आगे बढ़ती है और लोगों के दिलों को जोड़ती है। यह हिंदुस्तान का हृदय बनकर अपनी सरल और सहज चाल से सबको साथ लेती है। हिंदी संस्कृतियों के बीच पुल बनाती है और वर्जनाओं को तोड़ती है। यह सुहृदयजनों के भावों को अपनी ओर मोड़ती है और परंपराओं को तोड़कर नई परंपराएं बनाती है। हिंदी राम-रहीम और कृष्ण-करीम जैसी एकता को सामने लाती है, बंटी-बबली जैसी कहानियों को अपनाती है और अनेक भाषाओं के दरिया को अपनी ओर मोड़ती है। यह पूरब, पश्चिम, उत्तर और दक्षिण से दिलों को जोड़ती है, प्रेम और इंसानियत को बढ़ाती है और नफरतों को दूर करती है।

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