
विजया डालमिया, हैदराबाद
समुद्र से मिलने की धुन में
नदी मगन हो बहती चली जा रही थी।
जब समुद्र से जा मिली,
समुद्र ने कहा…
“न जाने कहाँ-कहाँ से होकर आई है।”
नदी शर्मिंदा हो गई…
नदी ने धीरे से कहा—
“मेरी हर बूंद में
सिर्फ समर्पण का भाव है।
तुमने यह सोचा नहीं
कि कितनी बाधाओं को पार कर
सिर्फ तुम तक आई हूँ।
मेरी हर बूंद में
सिर्फ और सिर्फ समर्पण की मिठास है।
हाँ, तुम्हारा खारापन
उस मिठास को समझ नहीं पाता,
पर मैं सिर्फ और सिर्फ
तुमसे मिलने आती हूँ,
और अपना अस्तित्व खोकर
तुम जैसी हो जाती हूँ।”
तभी एक तेज़ लहर आई,
और समंदर ने
उसे अपने आगोश में ले लिया।
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