स्वाभिमान का खून

ग्रामीण बस स्टैंड पर डरी हुई स्कूल गर्ल, महिला सुरक्षा और शिक्षा पर सवाल ग्रामीण बस स्टैंड पर डरी हुई स्कूल गर्ल

डॉ. रुपाली गर्ग, मुंबई

“बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ” – यह नारा जब पहली बार देशभर में गूंजा, तो उम्मीद जगी कि अब बेटियों को वह सम्मान, सुरक्षा और शिक्षा मिलेगी जिसकी वे सदा से हकदार हैं। लेकिन वर्षों बाद भी यदि कोई यह कहे कि यह नारा सिर्फ भाषणों और दीवारों तक सीमित है, तो क्या यह झूठ होगा? दुर्भाग्यवश, नहीं ?????

यह नारा जब पहली बार लोगों के कानों में पड़ा, तो लगा कि अब बदलाव की बयार बहेगी। बेटियों को जन्म से पहले मारने की क्रूर प्रथा पर रोक लगेगी, उन्हें शिक्षा मिलेगी, बराबरी का अधिकार मिलेगा। लेकिन जब हम ज़मीनी सच्चाई पर नजर डालते हैं, तो यह नारा सिर्फ एक आकर्षक वाक्य बनकर रह गया लगता है।

आज मैंने एक सम्मान का खून करती एक खबर पढ़ी जिसको पढ़ने के बाद अंतरआत्मा से एक ही सवाल उठा क्या हमारी भावी पीढ़ी आज भी सुरक्षित हैं???

शौचालय की दीवार पर खून से जांच सने हाथ पोंछने के निशान पाए गए। बच्चियों की कतार लगवाकर उनके कपड़े उतरवाए। यह उनकी निजता का हनन है। उनके मन पर ऐसी गहरी चोट है, जो शायद उम्र भर न मिटे। और उनके आत्मविश्वास, बचपन और मासूमियत पर हमला है।

आज भी कई परिवारों में बेटे की चाह में बेटियों को जन्म लेने से पहले ही मार दिया जाता है। कानून के बावजूद अवैध लिंग जांच हो रहे हैं। बेटी के नाम पर लोग झूठी शान को बचाते हैं, लेकिन असल में उसे जीवन देने से डरते हैं। लिंग जांच के अवैध तरीके अपनाए जाते हैं, और बेटियों को जन्म से पहले ही मिटा दिया जाता है। यह दर्शाता है कि मानसिकता में अब तक बहुत अधिक बदलाव नहीं आया।

नारा तो कहता है “बेटी पढ़ाओ”, लेकिन हकीकत में लाखों लड़कियाँ प्राथमिक शिक्षा तक भी नहीं पहुँच पातीं। कभी आर्थिक तंगी के कारण, कभी सामाजिक परंपराओं के कारण, और कभी यह सोचकर कि “लड़की तो पराया धन है, पढ़ाकर क्या होगा?” लड़कियों को स्कूल से निकाल दिया जाता है।

कई माता-पिता बेटियों को स्कूल या कॉलेज भेजने से डरते हैं, क्योंकि रास्ते असुरक्षित हैं, समाज में गंदे लोग हैं, और प्रशासन सुस्त है। यदि कोई बेटी आगे बढ़ना भी चाहती है, तो उसके रास्ते में समाज, परंपराएं और असुरक्षा दीवार बनकर खड़ी हो जाती हैं।आए दिन होने वाली छेड़छाड़, दुष्कर्म और मानसिक उत्पीड़न की घटनाएँ इस डर को और गहरा कर देती हैं।

लड़कियों के लिए असली बदलाव तब आएगा जब समाज की सोच बदलेगी। नारा लगाने से अधिक जरूरी है । बेटियों को आत्मसम्मान, अवसर और स्वतंत्रता देना। जब तक लड़कियों को बोझ, जिम्मेदारी या पराया धन समझा जाएगा, तब तक कोई भी अभियान सार्थक नहीं हो सकता। यही सोच उसे जन्म लेने से लेकर पढ़ाई करने तक, हर कदम पर रोकती है। और जब सोच ही संकीर्ण हो, तो नारे कुछ नहीं बदल सकते।

बेटी को बचाने और पढ़ाने के लिए नारे नहीं, नीयत बदलनी होगी।सोच बदलनी होगी। तभी यह नारा हकीकत बन पाएगा। बेटी देश का भविष्य है . और भविष्य को सिर्फ बचाना नहीं, सशक्त बनाना जरूरी है।

लेखिका के बारे में-


डॉ. रुपाली गर्ग
एक शिक्षिका, लेखिका और साहित्य साधिका हैं, जिन्होंने बरेली विश्वविद्यालय से पीएचडी तथा चेन्नई से MBA किया है।वे पिछले 2 वर्षों से लेखन में सक्रिय हैं और अब तक 300 से अधिक रचनाओं का सृजन कर चुकी हैं।
उनकी लेखनी में स्त्री, जीवन, वियोग और अनुभवों की गहराई झलकती है, साथ ही उन्हें जासूसी और दर्शनशास्त्र आधारित साहित्य पढ़ना विशेष रूप से पसंद है।
उनकी रचनाएँ 500+ साझा संकलनों व पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं, तथा वे कई साहित्यिक सम्मेलनों की गरिमा बढ़ा चुकी हैं. साथ ही उनकी 2 पुस्तकें प्रकाशित हैं और वे विभिन्न साहित्यिक मंचों पर उपाध्यक्ष एवं सह-संस्थापिका के रूप में सक्रिय हैं।


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9 thoughts on “स्वाभिमान का खून

  1. रूपाली जी, छोटे गांवों में आज भी लड़कियों की सही स्थिति को बयां किया है आपने। शहरों में आज स्थिति बदल चुकी है।‌

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