
शायर मलंग, फरीदाबाद
कुछ चेहरे उम्र से बूढ़े नहीं होते,
वे इंतज़ार से बूढ़े होते हैं।
कुछ आँखें रो-रोकर धुँधली नहीं पड़तीं,
वे अपनों के लिए दूर तक देखते-देखते थक जाती हैं।
और कुछ लोग… वे हारकर नहीं झुकते,
वे बस ज़िम्मेदारियों का बोझ उठाते-उठाते थोड़े झुक जाते हैं।
उस दिन जब मेरी नज़र उस बूढ़े आदमी पर पड़ी,
तो दुनिया की तरह मैं भी एक पल के लिए ठिठका था।
धूल से सना कुरता, थकी हुई देह, झुर्रियों में धँसा हुआ एक लंबा सफ़र, और चेहरे पर वैसी चुप्पी, जिसे लोग अक्सर ग़लती से हार समझ लेते हैं।
मगर मेरे साथ शैव था।
शैव चेहरों को देखता नहीं था उन्हें पढ़ता था। वो उन विरले लोगों में था जो किसी की आँखों में ठहरी हुई नमी देखकर उससे यह नहीं पूछते कि “क्या हुआ?”
बल्कि धीरे से कहते हैं “तुम्हारी चुप्पी बोलना चाहती है… मैं सुन सकता हूँ।”
उसने उस बूढ़े को कुछ देर बहुत ध्यान से देखा। उसकी दृष्टि में दया नहीं थी, एक लेखक की तरह एक जीवित कथा के प्रति सम्मान था। फिर उसने मेरी ओर देखा और बहुत धीमे स्वर में कहा
“लोग इस चेहरे को थकान कहेंगे…
मैं इसे बची हुई उम्मीद कहूँगा।
देखो, इसकी आँखों में हार नहीं है…
बस इतने सालों की धूप है कि चमक भीतर चली गई है।”
मैंने पहली बार उस बूढ़े को फिर से देखा। और सचमुच उसकी आँखें बुझी हुई नहीं थीं, वे भीतर कहीं धीमी आँच की तरह जल रही थीं।
शैव आगे बढ़ा। उसने झुककर नम्रता से कहा
“बाबा, अगर इजाज़त हो…
थोड़ी देर आपके पास बैठ जाऊँ?
कुछ चेहरे किताबों से बड़े होते हैं,
उन्हें खड़े-खड़े नहीं पढ़ा जाता।”
बूढ़े ने सिर उठाया। उसकी आँखों में हल्की-सी हैरानी थी, जैसे बरसों बाद किसी ने उसके कपड़ों को नहीं,
उसे देखा हो। वो हल्का-सा मुस्कुराया
“बैठ जाओ बाबू…
आजकल कौन किसी के पास बैठता है?”
शैव उसके पास ज़मीन पर ही बैठ गया। उसने अपनी डायरी जेब से निकाली, फिर उसे वापस रख दिया।
मैंने पूछा—“लिखोगे नहीं?”
शैव ने बिना मेरी ओर देखे कहा
“हर कहानी तुरंत नहीं लिखी जाती… कुछ पहले दिल में उतरती हैं, फिर शब्दों तक पहुँचती हैं।”
बूढ़े ने उसे गौर से देखा। जैसे वह समझ गया हो ये लड़का सिर्फ़ सुनने नहीं आया, ये शायद उसकी चुप्पी को इज़्ज़त देने आया है।
कुछ पल खामोशी रही। फिर शैव ने बहुत धीरे से पूछा
“बाबा…
ये जो आपकी आँखों में दूर तक फैला हुआ रास्ता है,
ये कहाँ जाता है?
गाँव तक… या किसी अधूरे सपने तक?”
उस सवाल ने जैसे उस बूढ़े की बरसों पुरानी चुप्पी पर दस्तक दी। उसने एक लंबी साँस भरी। हाथ की उँगलियों से मिट्टी कुरेदी। और बोला
“बेटा…
गाँव भी वही है,
सपना भी वही है।
बस आदमी शहर में अटक गया।”
शैव की आँखों में वही चमक आ गई जो किसी लेखक की आँखों में किसी असली वाक्य को सुनकर आती है।
वो थोड़ा और पास सरका।
“शहर आदमी को रोक लेता है बाबा…
या आदमी अपने लोगों के लिए खुद रुक जाता है?”
बूढ़ा मुस्कुराया। उस मुस्कान में पीड़ा थी, पर उससे ज़्यादा स्वीकृति।
“रोकता कोई नहीं बेटा…
हम खुद रुक जाते हैं।
पीछे बच्चे हों,
घर की कच्ची दीवारें हों,
बीमार औरत हो…
तो आदमी अपने पाँव नहीं,
अपने दिन गिरवी रख देता है।”
शैव ने जैसे उस वाक्य को भीतर उतार लिया। फिर उसने कहा
“आप जानते हैं बाबा,
कहानियों में लोग अक्सर किस्मत को दोष देते हैं।
मगर असल ज़िंदगी में मैंने देखा है
सबसे बड़े लोग वो होते हैं
जो बदकिस्मती की बात नहीं करते,
बस रोज़ की मजदूरी के बाद भी
अगले दिन काम पर चले जाते हैं।”
बूढ़े की आँखें इस बार भीगने से पहले चमक उठीं। उसने सिर हिलाया।
“किस्मत की बात करके क्या होगा बाबू?
रोटी किस्मत से नहीं सिकती।
हाथ चलाने पड़ते हैं।
हाँ…
इतना है कि कभी-कभी रात को
जब नींद नहीं आती,
तो अपने छोड़े हुए सपने याद आ जाते हैं।”
शैव ने तुरंत पूछा
“छोड़े हुए… या सँभालकर रखे हुए?”
बूढ़ा चौंका।
जैसे यह फ़र्क़ उसने खुद भी कभी इतने साफ़ शब्दों में न सोचा हो।
“क्या मतलब?”
शैव मुस्कुराया वही मुस्कान जो दर्द की तह तक उतरती है।
“मतलब ये बाबा…
कुछ लोग सपने छोड़ देते हैं,
और कुछ लोग उन्हें वक़्त से बचाकर रख देते हैं।
आप दूसरे वाले लगते हैं।
आपकी आँखें कहती हैं
आपने हारकर नहीं छोड़ा,
बस कह दिया…
‘ठहर जा, मैं लौटकर आता हूँ।’”
अब बूढ़े के चेहरे पर एक ऐसी खामोशी उतर आई
जिसमें सम्मान भी था, आश्चर्य भी, और शायद पहली बार अपने ही जीवन को किसी और की ज़बान से सुन लेने की तसल्ली भी।
उसने बहुत धीरे से कहा
“हाँ बेटा…
शायद ऐसे ही है।
गाँव में एक पुराना बक्सा है मेरा।
लोहे का।
जंग लगा हुआ।
उसमें लोग समझते हैं पुराने कपड़े रखे हैं।
पर सच कहूँ
उसमें मेरे ख्वाब रखे हैं।”
शैव ने उसकी आँखों में देखते हुए पूछा
“कैसे ख्वाब, बाबा?
वो जो पूरे नहीं हुए…
या वो जिन्हें अभी पूरा होना है?”
बूढ़े ने इस बार सिर उठाकर सीधे आसमान देखा। उसकी आँखों में जैसे अचानक पूरा गाँव उतर आया।
“एक पक्की छत…
कि बरसात में पानी टपके नहीं।
बेटे की पढ़ाई…
कि वो मेरी तरह धूप में न पके।
बिटिया की शादी…
कि उसकी विदाई में कमी न लगे।
और…”
वो ठहरा। चेहरे पर एक बहुत कोमल मुस्कान आई।
“उसकी अम्मा के लिए चाँदी की पायल।
शादी में पीतल पहनाई थी…
तब से मन में अटका है।”
शैव ने अपनी आँखें झुका लीं। जैसे वह उस एक वाक्य की गरिमा के सामने कुछ पल चुप रहना चाहता हो फिर उसने बहुत धीरे से कहा
“बाबा…
कितनी अजीब बात है ना…
दुनिया बड़े-बड़े सपनों पर किताबें लिखती है,
और असल महानता तो
एक चाँदी की पायल में छिपी मिलती है।”
बूढ़ा हँस पड़ा। खुलकर नहीं, पर भीतर से।
“हमारे सपने छोटे होते हैं बाबू…
पर उनके लिए उम्र लग जाती है।”
शैव ने जवाब दिया
“नहीं बाबा…
सपने छोटे नहीं होते।
बस वे इतने सच्चे होते हैं
कि उनमें दिखावा नहीं होता।
एक आदमी अगर अपने लिए महल नहीं,
अपनों के लिए छत चाहता है
तो यक़ीन मानिए,
वो इस दुनिया के सबसे बड़े सपनों में से एक है।”
मैंने देखा बूढ़े की आँखों के कोनों मेंपानी चमका, मगर उसने पलकों से उसे रोक लिया।वो बोला
“तुम लिखते हो क्या, बेटा?”
शैव हल्का-सा मुस्कुराया।
“जी…
लोग कहते हैं मैं कहानियाँ लिखता हूँ।
पर सच ये है बाबा,
मैं सिर्फ़ उन आवाज़ों को काग़ज़ देता हूँ
जिन्हें दुनिया सुनकर भी अनसुना कर देती है।”
बूढ़ा उसे देखता रहा। फिर बोला
“तो मेरी भी लिखना।
पर मुझे बेचारा मत लिखना।
लिखना कि मैं थका था…
पर टूटा नहीं था।
लिखना कि मैं गरीब था…
पर खाली नहीं था।
लिखना कि मैंने सपने छोड़े नहीं…
बस गाँव में रख आया था।”
ये सुनते ही शैव की आवाज़ भर्रा गई, पर शब्द पहले से भी ज़्यादा साफ़ निकले
“मैं आपको वैसा ही लिखूँगा बाबा,
जैसे आप हैं
एक ऐसे आदमी की तरह
जिसने अपनी भूख से बड़ी चीज़ बचाकर रखी…
उम्मीद।
और यक़ीन मानिए,
जिस आदमी की आँखों में उम्मीद बची हो,
वो इस दुनिया का सबसे अमीर आदमी है।”
हवा उस समय बहुत हल्की थी, पर माहौल में जैसे कुछ भारी उतर आया था। मैंने बूढ़े के चेहरे को फिर देखा। वहाँ अब सिर्फ़ झुर्रियाँ नहीं थीं वहाँ मौसम थे।बरसों की धूप थी। रात-रात भर जागी हुई चिंता थी।बेटी की विदाई की कल्पना थी। बेटे की फीस का हिसाब था। बीवी की पायल की अधूरी खनक थी। और उस सबके बीच एक अद्भुत बात थी उसकी आँखें अब भी भविष्य में देख रही थीं।
शैव ने जाते-जाते उससे पूछा
“बाबा, अगर मैं कभी आपके गाँव आऊँ…
तो वो बक्सा खोलेंगे?”
बूढ़े ने इस बार ज़ोर से हँस दिया।
“क्यों नहीं!
पर ध्यान रखना…
उसमें कपड़ों से ज़्यादा इंतज़ार मिलेगा।”
शैव ने तुरंत कहा
“मैं इंतज़ार ही देखने आऊँगा बाबा।
क्योंकि लेखक होने के नाते
मैंने सीखा है
सबसे सुंदर कहानियाँ वही होती हैं
जो पूरी होने से पहले भी
जीना नहीं छोड़तीं।”
हम लौटने लगे।
कुछ दूर जाकर शैव एक बार फिर मुड़ा। उसने उस बूढ़े को देखा उसी लाईट के नीचे बैठा हुआ, कमर झुकी हुई, चेहरा थका हुआ, पर आँखें…
आँखें अब भी किसी आने वाले कल के नाम थीं।
उसने अपनी डायरी निकाली। इस बार उसने लिखा। बहुत देर तक कुछ लिखता रहा। फिर मुझे पढ़कर सुनाया
“वो आदमी मजदूर नहीं था,
वो अपने सपनों का चौकीदार था।
शहर ने उससे उसकी जवानी ले ली,
पर उसने शहर को अपनी उम्मीद नहीं दी।
वो उसे गाँव के एक जंग लगे
बक्से में बंद कर आया था
ताकि एक दिन लौटकर
अपने पोते के सामने कह सके,
‘देख, तेरे दादा ने हार नहीं मानी थी।’”
मैंने उसकी तरफ़ देखा। शैव ने डायरी बंद की और बहुत धीमे स्वर में कहा
“कहानी लिखना आसान है…
किसी की मेहनत को उसकी इज़्ज़त के साथ लिखना मुश्किल।
आज पहली बार लगा
कुछ लोग पात्र नहीं होते,
पूरी सभ्यता का आख़िरी आत्मसम्मान होते हैं।”
और सच यही था। वो बूढ़ा आदमी गरीब नहीं था। थका हुआ ज़रूर था। झुका हुआ ज़रूर था। समय से घिसा हुआ ज़रूर था।
पर उसके भीतर अब भी एक पूरा आकाश रखा था एक लोहे के बक्से में बंद, गाँव के किसी कोने में, धूल की पतली परत के नीचे, और उम्मीद की गर्मी में सुरक्षित।
शायर मलंग,
वास्तविक नाम दिनेश चौधरी है, हरियाणा के फरीदाबाद के निवासी हैं।
उनका जन्म 25 अक्टूबर को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ।प्रारंभिक शिक्षा उन्होंने अग्रवाल सीनियर सेकेंडरी स्कूल से प्राप्त की।इसके बाद उन्होंने कंप्यूटर साइंस टेक्नोलॉजी में उच्च शिक्षा हासिल की।पेशे से वे एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर हैं।इंजीनियरिंग करियर के साथ-साथ उन्होंने दो पुस्तकों की रचना की।उनकी चर्चित पुस्तक “Zindage Ke Safar Par” भावनात्मक कविताओं का संग्रह है।लेखन की शुरुआत उन्होंने 7वीं कक्षा से ही कर दी थी।वे कविता, ग़ज़ल, लघु कथा और शायरी में विशेष रुचि रखते हैं। उनके लिए लेखन पेशा नहीं, बल्कि दिल की सच्ची भावनाओं की अभिव्यक्ति है।
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