अहं नहीं, वयं सत्य!

मशाल थामे साथ दौड़ते लोग, एकता और सामूहिक सफलता का प्रेरक दृश्य।

डॉ.नीरजा श्रीवास्तव ‘नीरू, फ़रीदाबाद (हरियाणा)

वापसी तय है,
तो क्या-क्या उखाड़ लेंगे?
चार दिनों में
खोद कितने पहाड़ लेंगे?

यहाँ जित्ता छुपा है,
कित्ता जो ताड़ लेंगे?
गर्व से चूर होके
झंडे कितने गाड़ लेंगे?

भूल जाते हैं हम
ज़्यादा समझने वाले,
अपने को सबसे आगे
जानने वाले।

आगे बढ़ते तो
हम सारे तभी हैं,
मशाल दूजे को
थमाते जब हैं।

रिले-रेस की कड़ी हैं हम,
लौ मिलकर ही जला पाएँगे।
अलग दौड़े हैं मगर,
मंज़िल साथ ही पाएँगे।

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